पीजीआई के हीप्टोलॉजी डिपार्टमेंट के एसोसिएट प्रोफेसर डा. अजय डुसेजा ने बताया कि लाइफ स्टाइल चेंज होने से लोग ओवरवेट, मोटापा और डायबिटीज का शिकार हो रहे हैं।
ये तीनों कारक ही फैटी लिवर के जिम्मेदार हैं। खास बात यह है कि यदि समय पर इसका टेस्ट नहीं कराया तो सिरोसिस लिवर हो सकता है।
उसके बाद लिवर को डैमेज होने से कोई नहीं बचा सकता। सिर्फ एक मात्र विकल्प ट्रांसप्लांट का बचता है। ट्रांसप्लांट में रुपयों का काफी खरचा आता है और सबसे बड़ी दिक्कत डोनर की आती है।
इससे एक मात्र बचने का रास्ता यही है कि अपनी लाइफ स्टाइल सुधारे। पीजीआई में आज से शुरू हो रही दो दिवसीय 13वीं करंट पर्सपेक्टिव इन लीवर डिजीज (सीपीएलडी) में भी चरचा होगी। कांफ्रेंस में पूरे देश से टॉप हीप्टोलाजिस्ट शिरकत करेंगे।
ऐसे होता है फैटी लिवर
शरीर में फैट स्टोरेज सेल होते हैं। इसमें शरीर का फैट जमा होता रहता है। जब सेल में फैट ज्यादा हो जाता है तो वह शरीर के अन्य हिस्सों में जाकर जमने लगता है। इसका कुछ हिस्सा लीवर पर भी जमा होता है। उससे लिवर में सूजन आने लगती है और लिवर सिकुड़ने लगता है।
यदि शुरुआती दौर में इसका पता चल जाए तो इसका इलाज संभव है। बाद में धीरे-धीरे लिवर सिरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। यदि एक बार सिरोसिस हो जाए तो उसके बाद यह बीमारी लाइलाज हो सकती है।
ऐसे बचे फैटी लिवर से
फैटी लिवर का सबसे ज्यादा खतरा ओवरवेट, मोटापा और डायबिटीज से होता है। इसलिए डायबिटीज होने या वजन बढ़ने पर समय-समय पर मरीजों को लिवर फक्शन टेस्ट कराते रहना चाहिए।
जैसे ही लिवर में चर्बी के लक्षण दिखे तो सतर्क हो जाना चाहिए। तुरंत विशेषज्ञ से मिलना चाहिए। खानपान व जीवनशैली को नियंत्रित करना चाहिए। नियमित व्यायाम और प्राणायाम आदि भी आपके उपचार में मददगार सिद्ध होंगे।