अमर उजाला से खास बातचीत करते हुए प्रोफेसर किरपाल कजाक ने कहा कि केवल किताबें-कॉपियों से पढ़ाई नहीं होती। जिंदगी जो सिखाती है या तजुर्बे देती है, वह भी पढ़ाई है। उन्होंने गुरबत में जीवन बिताते हुए अपनी कला को ऊपर ले जाने के लिए तपस्या की, साधना की। इसके अलावा उन्हें जीवन में कुछ अच्छे लोगों का भी साथ मिला। इसकी वजह से आज वह यह मुकाम हासिल कर पाए हैं।
उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार पाना उनके लिए बड़े गौरव की बात है। ऐसा लग रहा है कि आज तक जितनी भी मेहनत की, उसका फल मिल गया। उन्होंने कहा कि कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह लेखक बनेंगे। पिता राजमिस्त्री होने के साथ-साथ अरबी फारसी के विद्वान भी थे। पिता ने देखा कि पढ़ाई में उनकी रुचि नहीं है तो उन्होंने ही सबसे पहले साहित्यिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
33 से ज्यादा किताबें प्रकाशित
किरपाल कजाक की 33 से ज्यादा पुस्तकें छप चुकी हैं। साथ ही पंजाबी यूनिवर्सिटी से प्रकाशित खोज पत्रिका के विशेष अंकों का भी उन्होंने संपादन किया है। बच्चों के लिए कहानियां लिखी हैं। उन्हें 2010 में परम साहित्य सत्कार सम्मान, 1984 में भाई वीर सिंह गलप पुरस्कार, 2016 में पंजाब सरकार की ओर से स्टेट अवार्ड, 1996 में पंजाबी रंगमंच पुरस्कार समेत अन्य कई अवार्ड मिले हैं। उन्होंने कई टेलीफिल्मों और डाक्युमेंट्री के लिए लेखन किया है।