एक बच्ची, दुनिया में आई और बस 10 घंटे जी कर विदा हो गई। उसकी जान बच सकती थी, अगर ऐसा न होता तो। अब मां सवाल करती है कि क्या हो जाता, अगर डॉक्टर मेरी बच्ची की जांच कर लेते। तीन अस्पताल और एक सरकारी मेडिकल कॉलेज, पर किसी डॉक्टर को उस पर तरस नहीं आया। तीन बार रेफर किया गया, पर किसी ने इलाज करने की जहमत नहीं उठाई। हड़ताल ज्यादा जरूरी थी, अपनी जरूरतें बड़ी थीं। इंसानियत नाम की चीज ही नहीं, बस पैसे और जरूरतों से मतलब है तो डॉक्टर क्यों बने फिरते हैं?
कहते हुए मां फफक पड़ी। हुआ यूं कि हरियाणा के करनाल में निजी डॉक्टरों की हड़ताल और मेडिकल कॉलेज के हालातों ने नवजात बच्ची की जान ले ली। जन्म से मौत तक के करीब 10 घंटे के सफर में बच्ची को उपचार के लिए चार अस्पताल देखने पड़े।
पानीपत के दो निजी अस्पतालों और करनाल के कल्पना चावला मेडिकल कालेज ने इलाज के नाम पर केवल रेफर किया। मुश्किल से एंबुलेंस मिली तो उसका सहायक स्टाफ नहीं मिला। करीब पौने घंटे तक ईएमटी का इंतजार किया गया। समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण शाम करीब चार बजे बच्ची की चंडीगढ़ पीजीआई में मौत हो गई।
वेंटिलेटर न होने की बात कहकर चंडीगढ़ पीजीआई रेफर कर दिया
बच्ची को जन्म
- फोटो : अमर उजाला
जानकारी के अनुसार, पानीपत के गांव बबैल निवासी बाइक मिस्त्री विजय कुमार अपनी पत्नी गुड्डी को प्रसव पीड़ा होने पर जितेंद्रा अस्पताल में भर्ती कराया। यहां पर महिला ने सुबह करीब 6.30 बजे एक बच्ची को जन्म दिया। सांस लेने में तकलीफ होने के कारण बच्ची को इस अस्पताल से पानीपत के ही डॉ. हवा सिंह अस्पताल में रेफर कर दिया गया। यहां पर बच्ची को करीब तीन घंटे तक उपचार दिया गया।
तकलीफ ज्यादा होने की बात कह कर यहां से भी बच्ची को रेफर कर दिया गया। बच्ची को पानीपत के ही निजी अस्पताल रेनबो में जाने की सलाह दी गई। लेकिन परिजन बच्ची को लेकर दोपहर 12.30 बजे कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कालेज करनाल आ गए। यहां इमरजेंसी में बच्ची को चेक किया गया। ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों ने बेड खाली नहीं होने और वेंटिलेटर नहीं होने की बात कहकर बच्ची को चंडीगढ़ पीजीआई रेफर कर दिया।
बच्ची को चंडीगढ़ ले जाने के लिए बच्ची के पिता विजय ने एंबुलेंस बुलाई। दस मिनट के बाद एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस मौके पर पहुंची, लेकिन इसमें ईएमटी (इमरजेंसी मेडिकल टेक्निकल) नहीं मिला। ईएमटी का पौन घंटे तक इंतजार किया गया। इसके बाद पता चला कि संबंधित कर्मचारी छुट्टी पर है। इसके बाद आनन-फानन में दूसरी एंबुलेंस का इंतजाम करके बच्ची को लेकर दोपहर 1.30 बजे चंडीगढ़ के लिए निकले। ईएमटी को तरावड़ी से लिया गया।
शाम चार बजे बच्ची को पीजीआई चंडीगढ़ में दाखिल कराया गया। बच्ची को क्रिटिकल केयर यूनिट में ले गया और आक्सीजन देने की कोशिश की गई, लेकिन तब तक बच्ची सरकारी और निजी अस्पतालों के हालात के आगे जिंदगी की जंग हार चुकी थी। डाक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया।
डायरेक्टर के बेतुके बोल, डॉक्टरों ने सही ही कहा होगा
Baby Delivery
नवजात बच्ची की मौत के मामले में कल्पना चावला मेडिकल कालेज के डायरेक्टर सुरेंद्र कश्यप ने बेतुकी बातें कहीं। जब अमर उजाला ने उनसे इस संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा कि ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों ने जो कहा होगा, सही ही कहा होगा। मुझे तो पता नहीं कि आईसीयू में बेड थे या नहीं? जहां तक एंबुलेंस की बात है तो यह मेरे अंडर नहीं आती। यह तो सीएमओ के पास हैं। अभी हमारे पास वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है।
तो बच जाती बच्ची की जान
कल्पना चावला मेडिकल कालेज के पास एक एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस है, लेकिन प्रबंधन की ओर से अपनी एंबुलेंस उपलब्ध नहीं कराई गई, बल्कि 108 नंबर पर फोन करके सिविल अस्पताल की एंबुलेंस मंगवाई गई। एंबुलेंस तो पहुंच गई, लेकिन तकनीकी सहायक के नहीं आने के कारण बच्ची को काफी देर तक यहीं रहना पड़ा। अगर समय पर बच्ची को एंबुलेंस मिल जाती तो उसकी जान बच सकती थी।
जांच कराएंगे: सीएमओ
सीएमओ डॉ. योगेश शर्मा ने कहा कि वे मामले की जांच कराएंगे। पता किया जाएगा कि एंबुलेंस मिलने में देरी क्यों हुई और उस समय किसकी ड्यूटी थी। एंबुलेंस तो मेडिकल कालेज के पास भी है जो सारा दिन कालेज में रहती है। अगर इतनी इमरजेंसी थी तो हालात को देखते हुए उस एंबुलेंस को चंडीगढ़ भेजा जाना चाहिए था।
निजी डॉक्टरों की हड़ताल और सरकारी मेडिकल कालेज के हालात ने मुझसे मेरी बच्ची छीन ली। कल्पना चावला मेडिकल कालेज के डॉक्टरों ने बच्ची को चेक किए बिना ही रेफर कर दिया। उन्होंने दो टूक कह दिया कि हमारे पास न तो बेड और न ही वेंटिलेटर।
- विजय, नवजात बच्ची के पिता