नौ जनवरी को चंडीगढ़ को 25वां मेयर मिलेगा, लेकिन इस बार फिर भाजपा के सामने कांग्रेस की बजाय अपनों से निपटने की चुनौती है। वजह इस समय पार्टी का चार गुटों में बंटना है। फिर भी भाजपा के आला नेताओं की हरसंभव कोशिश होगी कि साल 2001 का इतिहास न दोहराया जा सके। 2001 में भाजपा की ओर से क्रॉस वोटिंग के कारण ही कांग्रेस ने महज तीन पार्षद होते हुए भी मेयर की कुर्सी पर कब्जा कर लिया था। इसीलिए इस बार के चुनाव में भी पार्टी का पहला टारगेट क्रॉस वोटिंग रोकना होगा।
कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी का उम्मीदवार तय होने के बाद अलग-अलग धड़ों से जुड़े वोटर दल की मर्जी के विपरीत क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। हालांकि अभी तक यह तय माना जा रहा है कि पार्टी का उम्मीदवार जो भी होगा, उसका मेयर बनना निश्चित है। भाजपा का मानना है कि इस साल के अंत या साल 2019 के शुरुआती माह में लोकसभा चुनाव होने की उम्मीद है। ऐसे में इसी साल पार्टी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट जाएगी।
ऐसे में मेयर पद के चुनाव के लिए उम्मीदवार तय करवाने के मामले में पिछले कई माह से अलग-अलग गुट लॉबिंग करने में जुटे हुए हैं। इस समय भाजपा में संजय टंडन, सांसद किरण खेर, पूर्व सांसद सत्यपाल जैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरमोहन धवन समेत चार गुट हैं। जो समय-समय एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोलते रहे हैं। एक गुट को पता है कि दूसरा गुट उन्हें हराने का प्रयास करने के लिए क्रॉस वोटिंग कर सकता है। ऐसे में तय उम्मीदवार को यह प्रयास करना होगा कि वोट क्रॉस न हो।
वहीं पार्टी में विरोधी रुख अख्तियार करने वाले नेताओं को शांत कराने की जिम्मेदारी हाईकमान की होगी। नवनियुक्त मेयर का लोकसभा चुनाव की तैयारियों में अहम रोल होगा। चुनाव जो जीतेगा वह अपने सरकारी कार्यक्रमों में अपने गुट के सीनियर नेताओं को लोकसभा चुनाव में टिकट के दावेदार के तौर पर प्रमोट करेगा।
साल 1998 में बागी उम्मीदवार ने किया था करिश्मा
Chandigarh BJP
- फोटो : अमर उजाला
इस समय भाजपा में सांसद किरण खेर और भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी के टिकट के दावेदार हैं। इसीलिए खेर पिछले कई माह से देवेश मोदगिल और भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन अरुण सूद को मेयर पद का उम्मीदवार बनवाने का प्रयास कर रहे हैं।
जाहिर है एक गुट का उम्मीदवार तय करने पर दूसरा गुट अपनी नाराजगी जाहिर करेगा। इस बार यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा में कोई बागी उम्मीदवार भी मैदान में उतर सकता है। भाजपा में पहले ऐसा हो चुका है। साल 1998 में केवल कृष्ण आदिवाल ने बगावत कर नामांकन दाखिल किया था, हालांकि मेयर चुनाव जीतने के बाद ही आदिवाल ने यह कहा था कि वह भाजपा में ही हैं।
दो साल से हो रही है क्रॉस वोटिंग
कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि उनके वोटरों की संख्या 4 है। यदि गिनती में उनका वोट 8 से 10 भी पहुंच जाता है, तो भी उनकी जीत होगी, क्योंकि इससे भाजपा पार्षदों की तरफ से क्रॉस वोटिंग सामने आ जाएगी। साल 2016 में भी भाजपा पार्षदों ने मेयर पद के चुनाव में क्रॉस वोटिंग की थी।
उस समय कांग्रेस के वोटरों की संख्या आठ थी, लेकिन उनके उम्मीदवार मुकेश बस्सी को 15 मत पड़े। वहीं पिछले साल भी जब वित्त एवं अनुबंध कमेटी का चुनाव हुआ, तो क्रॉस वोटिंग के कारण भाजपा की उम्मीदवार हीरा नेगी हार गई थीं। वहीं कांग्रेस के देवेंद्र सिंह बबला ने जीत दर्ज की थी।
मनोनीत पार्षदों पर आरोप लगाकर बचना मुश्किल
Chandigarh BJP Protest
इससे पहले जब-जब राजनीतिक दलों के पार्षद क्रॉस वोटिंग करते रहे हैं, चुनाव बाद आरोप मनोनीत पार्षदों पर ही लगे। हालांकि इस बार ऐसा नहीं किया जा सकेगा, क्योंकि 21 साल बाद ऐसा पहली बार होगा जब नौ मनोनीत पार्षद मतदान नहीं करेंगे। ऐसे में इस बार यदि क्रॉस वोटिंग की नौबत आई तो हार का ठीकरा फोड़ने के मामले में कोई भी दल मनोनीत पार्षदों पर आरोप लगाकर नहीं बच सकेगा।
निगम पर 14 साल बाद हुआ था भाजपा का कब्जा
साल 1996 में नगर निगम का गठन हुआ था। उसी साल के दिसंबर माह में 20 सीटों पर चुनाव हुए थे। जबकि मनोनीत पार्षदों की संख्या उस समय से लेकर अब तक 9 ही है। नगर निगम के शुरुआती दौर के चुनाव में भाजपा को बहुमत मिली। साल 1997 से लेकर 2000 तक निगम पर भाजपा के मेयर का कब्जा रहा। \
जबकि साल 2001 से लेकर 2015 तक नगर निगम के मेयर पद पर कांग्रेस का कब्जा रहा। साल 2016 में 14 साल बाद भाजपा के अरुण सूद मेयर बने। उस समय मनोनीत पार्षदों को वोटिंग का अधिकार था। इसी के सहारे भाजपा का नगर निगम पर कब्जा हो सका। साल 2017 में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत था, ऐसे में मेयर आशा जसवाल बनीं।