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आखिर किन आंकड़ों पर दिया जाट समेत 6 जातियों को आरक्षण: हाईकोर्ट

Fri, 30 Sep 2016 11:13 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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highcourt
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हरियाणा सरकार की ओर से जाटों समेत छह जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग के रूप में एक्ट बनाकर नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण दिए जाने के मामले में शुक्रवार को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से पूछ लिया कि आखिर किन आंकड़ों के आधार पर आरक्षण का लाभ दिया गया है।
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इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से एक अर्जी दाखिल कर उन आंकड़ों को हरियाणा सरकार से मुहैया कराने की अपील की गई, जिनके आधार पर हरियाणा सरकार ने आरक्षण का लाभ दिया है। जस्टिस एसएस सारों व जस्टिस लीजा गिल की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता की अर्जी पर हरियाणा सरकार को नोटिस जारी कर उक्त आरक्षण के लिए प्रयुक्त आंकड़ों की जानकारी देने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्तूबर को होगी।

शुक्रवार को सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट मुकेश कुमार वर्मा द्वारा दायर की गई अर्जी पर बहस शुरू हुई। अर्जी में वर्मा का कहना था कि जाटों को हरियाणा में आरक्षण का लाभ देने के लिए हरियाणा सरकार द्वारा पहले एक्ट लाया गया और उसके बाद पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया।
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उन्होंने आरोप लगाया कि हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंदिरा साहनी मामले में दिए गए निर्देशों की पालना भी नहीं की गई। उनका कहना था कि आरक्षण का लाभ देने के लिए संविधान में अनुच्छेद 16 की उप धारा 4 में प्रावधान है, जिसके तहत राज्य सरकार को अधिकार है कि उनकी राय में जो वर्ग पिछड़ा है, उसे आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है।
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याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट वर्मा ने कहा कि यहां राय शब्द के लिए भी व्याख्या मौजूद है, जिसके तहत आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद ही आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है। उन्होंने अदालत से कहा कि हरियाणा सरकार के पास केसी गुप्ता आयोग की रिपोर्ट के अलावा कोई आंकड़े मौजूद नहीं हैं, जिन्हें आरक्षण देने का आधार बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट तैयार करने के लिए एमडीयू से सर्वे करवाया गया था, जिसे पहले ही चुनौती दी जा चुकी है।

हरियाणा सरकार की ओर से अदालत में मौजूद एडवोकेट जगदीप धनखड़ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की सूची में जाटों को आरक्षण देने का मामला था और सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की सूची के मामले में नहीं बल्कि केंद्र की सूची के बारे में फैसला सुनाया था। उन्होंने हाईकोर्ट से कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने केसी गुप्ता आयोग की सिफारिशों को खारिज नहीं किया था बल्कि उन्होंने एनसीबीसी (नेशनल कमीशन फार बेकवर्ज क्लासेस) की उस रिपोर्ट को मंजूरी दी थी, जिसमें केसी गुप्ता आयोग की सिफारिशों को न मानने का फैसला लिया गया था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट ने केसी गुप्ता आयोग की सिफारिशों को खारिज कर दिया था।

इस पर जस्टिस एसएस सारों व जस्टिस लीजा गिल की खंडपीठ ने हरियाणा सरकार से पूछा कि जब सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की सूची के लिए केसी गुप्ता आयोग की रिपोर्ट को आधार नहीं माना तो राज्य में आरक्षण देने के लिए इसे हाईकोर्ट क्यों स्वीकार करे? जवाब में हरियाणा सरकार की ओर से कहा गया कि एनसीबीसी और राज्य का आयोग दो अलग बॉडी हैं। दोनों बॉडी स्वतंत्र हैं और एक दूसरे की राय मानने के लिए बाध्य भी नहीं है। हरियाणा सरकार की तरफ से कहा गया कि भले ही एनसीबीसी ने केसी गुप्ता आयोग की सिफारिशों को नहीं माना, लेकिन हरियाणा का आयोग अगर इसे मान रहा है तो इसे गलत नहीं माना जा सकता।

 
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