फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'आरक्षण के लिए जातियों को जोड़ते हुए राजनीति नहीं, आंकड़े बनते हैं आधार'

Tue, 12 Sep 2017 03:29 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
कोर्ट - फोटो : सांकेतिक चित्र
विज्ञापन
राजनीति के लिए आरक्षण का इस्तेमाल और मंडल कमिशन की रिपोर्ट के आधार पर दिए आरक्षण को रिव्यू न करने को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल किया। इस जवाब में सरकार ने सभी आरोपों को नकार दिया। इसके साथ ही अभी ओबीसी सूची के लिए केंद्र ने एनसीबीसी (नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लास) की रिपोर्ट को काफी बताया।
विज्ञापन


केंद्र ने कहा कि आंकड़ों के आधार पर आरक्षण दिया जाता है न कि किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए स्नेहांचल चेरिटेबल सोसाइटी की ओर से कहा गया कि भारत में आजादी के बाद जब संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया, तब से लेकर अब तक राजनीति के लिए इसका इस्तेमाल किया गया है। वोट बैंक के लिए आरक्षण पाने वाली जातियों की संख्या में बढ़ोतरी को कर दी जाती है परंतु किसी जाति को इससे बाहर नहीं किया जाता है।

याची ने कहा कि आरक्षण लागू करते हुए हर 10 वर्ष में इसे रिव्यू करने का प्रावधान रखा गया था परंतु यह कार्य किसी ने भी नहीं किया। याची ने कहा कि हरियाणा में आरक्षण के लिए मंडल कमिशन की रिपोर्ट को 1995 में अपनाया गया और इस रिपोर्ट के आधार पर शेड्यूल ए और बी तैयार किया गया था। इस रिपोर्ट में भी यह कहा गया था कि 20 वर्षों में पिछडे़ वर्ग को दिए गए आरक्षण की समीक्षा की जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन

याची ने ये सब दलीलें भी दीं

court
याची ने कहा कि इस आयोग की रिपोर्ट को 1980 में सौंपे जाने के बाद 1995 में अपनाया गया, जिससे 15 साल वैसे ही बीत गए। इसके चलते 2000 में इसकी समीक्षा होनी चाहिए थी परंतु 2016 तक 36 साल बीत गए हैं, लेकिन किसी भी स्तर पर समीक्षा का प्रयास नहीं किया गया। याची ने कहा कि एनसीबीसी और सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में आरक्षण व्यवस्था के लिए आंकड़े एकत्रित करने और समीक्षा करने के लिए पूरा प्रोसेस बताया है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने हित साधने के लिए इस प्रोसस को अपनाया ही नहीं।

1993 में कंबोज कमिशन बनाया गया तो वहीं 1999 में गुरनाम सिंह कमिशन बनाया गया। इन सभी में कुछ जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की बात तो कही गई, परंतु आंकड़ों के आधार पर किसी को बाहर करने की बात नहीं कही गई। याची ने कहा कि 1951 से लेकर अभी तक केवल जातियों को ही शामिल किया गया है। हाईकोर्ट ने इस पर याची से पूछा कि इस बारे में क्या किया जा सकता है।

याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने वर्तमान में हरियाणा सरकार की ओर से बनाए गए पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने वाले एक्ट को चुनौती दी है। ऐसे में इन सभी के आरक्षण की समीक्षा का जिम्मा सौंपा जाना चाहिए और यह जानने का प्रयास किया जाना चाहिए कि कौन सी जाति आरक्षण का लाभ पाकर आगे बढ़ी है और उस जाति को पिछड़ा वर्ग की सूची से बाहर किया जाना चाहिए। याची ने उदाहरण के माध्यम से कहा कि 1951 से 71 जातियों को पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्ष लाभ प्राप्त है और क्या अभी तक इनमें से कोई एक जाति भी आगे नहीं बढ़ पाई है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें