कृषि कानूनों के वापस होने के बावजूद हरियाणा में भाजपा-जजपा को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा। आंदोलनरत किसानों को अपने साथ लाना दोनों दलों के लिए आसान नहीं है। आंदोलन की अगुवाई कर रहे अधिकतर किसान संगठन सत्तारूढ़ दलों से दूर ही रहे हैं। उनकी अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाए भी हैं। जिसे लेकर उनकी सियासी राह अलग ही रहती है।
गठबंधन सरकार किसानों को नजरअंदाज भी नहीं कर सकती। चूंकि, हरियाणा कृषि प्रधान प्रदेश है और 70 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर ही निर्भर है। छोटे व मझोले किसान अधिक हैं, जिनका राजनीति में दखल काफी रहता है। जीटी रोड बेल्ट के अलावा सिरसा, कैथल, हिसार, रोहतक, भिवानी, जींद, फतेहाबाद, महेंद्रगढ़ के किसान परिवार सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
भाजपा इन जिलों में अपनी स्थिति और कमजोर नहीं करना चाहती। बीते विधानसभा चुनाव में किसानों की नाराजगी के कारण ही कृषि मंत्री ओपी धनखड़, वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला जैसे दिग्गज हार का सामना कर चुके हैं।वर्तमान में हरियाणा में भाकियू चढूनी व रतन मान गुट आंदोलन में अग्रणी भूमिका में रहे हैं।
चढूनी की जीटी रोड बेल्ट के अलावा अन्य जिलों में अच्छी पैठ है, इसलिए आंदोलन को गति प्रदान करने में वह आगे रहे। निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू, सोमबीर सांगवान इत्यादि ने भी किसानों का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। इनेलो इनेता अभय चौटाला ने तो विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। अब वह उपचुनाव जीतकर दोबारा विधायक बने हैं। उनकी भविष्य की राजनीति पूरी तरह से किसानों पर केंद्रित रहने वाली है।
पूर्व में चुनाव लड़ चुका चढूनी दंपती
गुरनाम सिंह चढूनी व उनकी पत्नी भी पूर्व में चुनाव लड़ चुके हैं। भविष्य में भी उनके चुनावी रण में उतरने से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए उनके साथ अन्य संगठनों का मनमुटाव चलता रहता है। आंदोलन के दौरान उन पर कई तरह के आरोप भी लगे, लेकिन साबित नहीं हो पाए। पंजाब के नेताओं के साथ उनकी तनातनी जगजाहिर है। भाजपा के साथ उनका दूर-दूर तक नाता नहीं। ऐसे में आंदोलन में शामिल किसानों को साधना सत्तारूढ़ दलों के लिए बड़ी चुनौती है।
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किसान हित में पीछे नहीं हटेंगे : भाकियू
भाकियू अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी, प्रवक्ता राकेश बैंस, बलविंद्र सिंह और नरेंद्र बढ़ाली ने कहा कि किसान हित में आंदोलन से पीछे नहीं हटेंगे। अभी प्रधानमंत्री ने कानून वापस लेने की घोषणा की है। इन्हें संसद में वापस लिया जाना है। किसानों की और भी मांगें हैं। संयुक्त किसान मोर्चा केनिर्णय अनुसार आगे बढ़ेंगे। किसानों की कर्ज माफी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को पूरी तरह लागू करने पर सरकार अब भी चुप है। इन पर भी सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। 2022 तक किसानों की आयु दोगुना करने का दावा करने वाली केंद्र सरकार बताए कि डेढ़ महीने बाद जनवरी में किसानों की फसलों को दोगुना दामों पर कहां खरीदेगी।