गांवों का विकास होगा तभी देश-प्रदेश का विकास होगा, इसी बात को ध्यान में रखते हुए हरियाणा सरकार गांवों पर विशेष ध्यान दे रही है। गांवों के विकास के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये का बजट जारी होता है। गांवों की सड़कों और गलियों के मामले में पहले के मुकाबले सुधार हुआ है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या गांवों में फैली गंदगी और जोहड़ों से आने वाली दुर्गंध है।
स्वच्छता को लेकर सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन अभियान चलाया है, फिर भी गांवों की तस्वीर इसके विपरीत है। गांवों की सूरत और सीरत कैसे बदलेगी और किस प्रकार से गांव भी शहरों की तर्ज पर विकसित होंगे समेत तमाम मुद्दों को लेकर ग्रामीण विकास विभाग के निदेशक और विशेष सचिव आईएएस जय कृष्ण आभीर से अमर उजाला ने विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश...
गांवों में सफाई की स्थिति बहुत खराब है, ऐसा क्यों?
पहले के मुकाबले स्थिति में काफी सुधार हुआ है। स्वच्छता अभियान से लोगों में जागरूकता आई है। जागरूकता का ही असर है कि ओडीएफ प्लस प्लस में हरियाणा की रैंकिंग 37 फीसदी से बढ़कर 92.40 फीसदी पहुंच गई, जबकि केंद्र का प्रतिशत 86.96 है। जहां-जहां दिक्कतें हैं, उन गांवों को चिह्नित किया जा रहा है और संबंधित ब्लॉक अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। जल्द वहां भी असर दिखेगा।
गांवों में स्वच्छता के लिए विभाग की कोई नई योजना?
सरकार का प्रयास है कि शहरों की तर्ज पर गांवों में भी घर-घर से कूड़ा एकत्र किया जाए। पंचायतों के साथ मिलकर इस योजना को अमलीजामा पहनाया जाएगा। अभी यह योजना पांच हजार से अधिक आबादी वाले गांवों में शुरू की गई है।
घरों से कूड़ा कैसे एकत्र होगा, पंचायतों के पास वाहन नहीं हैं?
कूड़ा एकत्र करने वाले वाहन टिप्पर की खरीद प्रक्रिया विभाग ने शुरू कर दी है। प्रथम चरण में 160 वाहन खरीदे जा रहे हैं। वाहन आने के बाद उन्हें अलग-अलग पंचायतों का क्षेत्र अलॉट कर दिया जाएगा। ये वाहन घर-घर जाकर कूड़ा एकत्र करेंगे और पंचायत द्वारा तय स्थान पर कूड़ा डालेंगे।
गांवों में सबसे बड़ी दिक्कत कूड़ा निस्तारण की है, इसका हल कैसे होगा?
कूड़ा निस्तारण के लिए विभाग ने दो हजार गांवों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र लगाए हैं। शेष चार हजार गांवों में इसका कार्य किया जाना है। यहां पर कूड़े को अलग-अलग किया जाएगा और इसके बाद इसके निस्तारण की प्रक्रिया होगी। कई स्थानों पर खाद बनाने की भी योजना है।
ठोस कचरा प्रबंधन में सरकार कोई मदद करती है?
पांच हजार तक आबादी वाले गांवों को सरकार की ओर से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए प्रति व्यक्ति 60 रुपये और ग्रे वाटर प्रबंधन के लिए प्रति व्यक्ति 280 रुपये दिए जाते हैं। पांच हजार से अधिक आबादी वाले गांवों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए प्रति व्यक्ति 45 रुपये और ग्रे वाटर प्रबंधन के लिए प्रति व्यक्ति 660 रुपये दिए जाते हैं।
मनरेगा के नाम पर होने वाले फर्जीवाड़े को कैसे रोका जाएगा?
पहले ऐसे मामले सामने आते थे, अब ऐसा नहीं है। हरियाणा में सरकार ने नेशनल मोबाइल मॉनीटरिंग सिस्टम (एनएमएमएस) लागू किया हुआ है। जहां 20 से अधिक मनरेगा मजदूर कार्य करेंगे, वहां पर इस सिस्टम से हाजिरी लगेगी। यह हाजिरी दो बार लगती है। इसके अलावा हर जिले में लोकपाल भी नियुक्त कर दिया गया है।
क्या मनरेगा का दायरा बढ़ाया गया है?
पहले के मुकाबले अब मनरेगा का दायरा बढ़ा है। विभाग ने 700 गांवों की व्यायामशालाओं को दुरुस्त करने का लक्ष्य रखा है। साथ ही गांवों में छोटे स्टेडियम में भरत कराने से लेकर यहां पर सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। यह सारा कार्य मनरेगा के तहत ही कराया जाएगा। इसके अलावा गांव में कीचड़ और ऊंची-नीची गली को भी सही करने का काम मनरेगा से होगा।
गांवों में तालाबों की दशा सुधारने के लिए कोई प्लान है?
ये सच है कि तालाबों से दिक्कतें आ रही हैं। अब घरों का दूषित पानी जोहड़ों में जाता है। इनके सुधार के लिए पोंड अथॉरिटी काम कर रही है। जिन गांवों में पोंड अथॉरिटी नहीं पहुंच पाई है, वहां जोहड़ों का सुधार विभाग करेगा। इसके लिए विभाग ने पोंड अथॉरिटी से मदद मांगी है, तकनीक का इस्तेमाल करके जोहड़ों को सुधारा जाए।
सरकारी की योजनाओं की जानकारी पंचायतों को कैसे देंगे?
इसके लिए भी खाका तैयार किया गया है? फील्ड में लगातार योजनाओं की जानकारी के लिए शिविर लगाए जाएंगे। एक-एक योजना का फायदा पंचायतों को बताया जाएगा, ताकि जमीनी स्तर पर योजना का लाभ ग्रामीणों को मिल सके।