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चंडीगढ़ से उद्योगों का पलायन तेज, प्रशासन के इस फैसले ने उड़ा रखी है उद्योगपतियों की नींद  

Wed, 10 Feb 2021 10:23 AM IST
निवेदिता वर्मा रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
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चंडीगढ़ में ट्रांसफर फीस महंगी होने से उद्योगपति परेशान। - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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चंडीगढ़ से उद्योगों का पलायन बहुत तेजी से हो रहा है। औद्योगिक क्षेत्र-एक और दो से करीब आधे उद्योग मोहाली, पंचकूला, डेराबस्सी, बद्दी शिफ्ट हो चुके हैं। इसका कारण है चंडीगढ़ प्रशासन के फैसले। औद्योगिक क्षेत्र में संपत्तियों के आवंटन को हुए करीब 50 साल होने को हैं, लेकिन अब तक उद्योगपति नाम नहीं बदलवा पा रहे हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि प्रशासन ने जितनी ट्रांसफर फीस तय की है, उतने में नया प्लॉट खरीदा जा सकता है।
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चंडीगढ़ में वर्ष 1971-72 में औद्योगिक क्षेत्र-एक और दो में करीब 3700-3800 प्लॉट आवंटित किए गए थे। आवंटन के समय यह नियम जोड़ा गया कि आवंटन के 15 साल तक उस संपत्ति को किसी और के नाम पर ट्रांसफर/बेचा नहीं जा सकेगा। 15 साल के बाद अगर कोई ट्रांसफर करना चाहेगा तो उस समय के कलेक्टर रेट और जिस दाम पर प्लॉट आवंटित हुआ था, उसके बीच की राशि में से आधे पैसे प्रशासन के पास जमा कराना होगा। अगर ऐसा नहीं होता है, तो संपत्ति ट्रांसफर नहीं होगी। 


इसके अलावा अगर 33 साल बाद संपत्ति को बेचा जाएगा, तो उस समय के कलेक्टर रेट और जिस दाम पर प्लॉट आवंटित हुआ है, उसके बीच की राशि में से एक तिहाई पैसे को प्रशासन को देना होगा। जो पैसा प्रशासन को दिया जाता है, उसे अनअर्न्ड प्रॉफिट कहा जाता है। यह राशि करोड़ों में होती है, इसलिए कोई भी व्यक्ति ट्रांसफर नहीं करवाता है।
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लगभग पूरे औद्योगिक क्षेत्र व सेक्टरों की कई संपत्तियां मालिक द्वारा लिखे इच्छापत्र और सामान्य वकालतनामा (जीपीए) पर ही चल रही हैं। उद्योगपतियों का कहना है कि प्रशासन ने लोगों को बांध कर रखा हुआ है। वह उद्योग जगत तो बढ़ते हुए देखना नहीं चाहते हैं। इस तरह चंडीगढ़ में उद्योगपति पिछले कई साल से प्रशासन की ओर से वसूले जा रहे अनअर्न्ड प्रॉफिट से परेशान हैं, लेकिन कोई समाधान नहीं हो रहा है।
 
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उदाहरण से समझिए कितनी परेशानी में हैं शहर के उद्योगपति

चंडीगढ़ में अगर एक उद्योगपति अपने 500 गज के प्लाट को बेचना चाहता है और उसकी कीमत साढ़े चार करोड़ रुपये लगाई गई है तो प्रशासन के कानून के तहत इसमें से एक तिहाई यानी करीब डेढ़ करोड़ रुपये बेचने वाले उद्योगपति को प्रशासन के पास जमा कराना होगा। तभी यह संपत्ति खरीदने वाले व्यक्ति के नाम पर हो पाएगी। उद्योगपति कहते हैं कि अपनी संपत्ति को बेचने के बाद जितना पैसा प्रशासन को देना पड़ता है, उतने में तो पंचकूला, मोहाली, बद्दी या डेराबस्सी में 500 गज से ज्यादा का प्लाट खरीदा जा सकता है। इसी तरह किसी उद्योगपति के पास पंचकूला में 500 गज की कोई संपत्ति है और वह उसे बेचता है तो उसे प्रशासन को सिर्फ 5 लाख रुपये ही चुकाने पड़ते हैं। मोहाली में यह ट्रांसफर फीस शून्य है।  

ट्रांसफर फीस होनी चाहिए कम
ट्रांसफर के लिए प्रशासन ने जो दाम तय किए हैं, वह बहुत ज्यादा हैं। इतने ज्यादा कि कोई ट्रांसफर कराने की सोचता भी नहीं है। इस वजह से ज्यादातर संपत्तियों के मालिकाना हक को लेकर काफी विवाद है। प्रशासन से कई बार मांग की है कि ट्रांसफर मुफ्त कर दिया जाए या फिर अगर शुल्क रखे जाते हैं तो वह कम होने चाहिए।  - सुनील कुमार, वाइस-प्रेसिडेंट, लघु उद्योग भारती

प्रशासन को हमने कई मांग पत्र सौंपे
शहर के उद्योग तेजी से पलायन कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन को इस बात अंदाजा भी नहीं है। ऐसा लगता है, मानों उद्योगपतियों को एक जंजीर में बांध कर रखा गया है, जिसकी वजह से वह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। न ही कोई अपना काम बढ़ा पा रहा है। प्रशासन को हमने कई मांग पत्र सौंपे हैं।  - अवि भसीन, सलाहकार, चंडीगढ़ इंडस्ट्रियल यूथ एसोसिएशन

अनअर्न्ड प्रॉफिट का मुद्दा बहुत बड़ा
शहर में अनअर्न्ड प्रॉफिट का मुद्दा बहुत बड़ा है। प्रशासन के अधिकारियों ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। वह अपनी जिम्मेदारी से भागते नजर आते हैं, जिसकी वजह से शहर का उद्योग जगत खत्म होता जा रहा है। ट्रांसफर फीस कम करनी चाहिए, ताकि उद्योगपतियों को लाभ हो।  - कैलाशचंद जैन, संयोजक, चंडीगढ़ उद्योग व्यापार समूह

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