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कालका शिमला ट्रैक का सर्वे, रेलवे की टॉय ट्रेनों की स्पीड बढ़ाने की योजना, पर संभव नहीं...

Thu, 03 Jan 2019 01:56 PM IST
खुशबू गोयल दीपक शाही, अमर उजाला, जीरकपुर
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कालका शिमला ट्रैक
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टॉय ट्रेन की स्पीड बढ़ाने के लिए रेलवे ने आरडीएसओ की टीम भेजकर कालका शिमला हेरिटेज ट्रैक का सर्वे कराया। लेकिन यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर घोषित कालका-शिमला रेलमार्ग पर 48 डिग्री के करीब 600 कर्व हैं। ऐसी स्थिति में 35 किमी से अधिक रफ्तार से सात डिब्बों वाली टॉय ट्रेन को दौड़ाने का मतलब अक्तूबर 2015 डिरेल वाले हादसे को दोहराना है। बता दें कि 2015 में टॉय ट्रेन की स्पीड महज 3 से 5 किलोमीटर प्रति घंटा बढ़ाने की कोशिश की गई थी। उस समय सितंबर और अक्तूबर में दो बार टॉय ट्रेन डिरेल हुई थी।
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सितंबर के हादसे में तीन ब्रिटिश महिलाओं की मौत हो गई थी, जबकि 20 लोग घायल हुए थे। एक बार फिर केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल के आदेशों के बाद कालका-शिमला ट्रैक पर लखनऊ से रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन (आरडीएसओ) की टीम द्वारा सर्वे किया गया है। टॉय ट्रेन की स्पीड बढ़ाने के लिए दिसंबर को लखनऊ से आरडीएसओ के करीब 10-15 सदस्य कालका पहुंचे थे। टीम ने नैरो गेज डीजल शेड लोको 706 (इंजन) में स्पीड 25 से बढ़ाकर 37 किलोमीटर प्रति घंटा मापने के उपकरण फिट किए।

जैसे ही इंजन की स्पीड 37 किमी प्रति घंटा की रफ्तार पर पहुंची, इंजन अप डाउन जर्क करने लगा। उसके बाद इंजन की स्पीड का अधिकतम निर्धारित मानक 35 रखा गया है। इस स्पीड पर इंजन सही रफ्तार पर चल रहे थे।  रेलवे के अधिकारिक सूत्रों कि माने तो इसी मानक के आधार पर 35 किमी प्रति घंटा के रफ्तार से कालका-शिमला रेल मार्ग पर टॉय ट्रेन चलाने की बात भी कही जा रही है, लेकिन अभी लखनऊ से आई आरडीएसओ की टीम की फाइनल रिपोर्ट देने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। अब सवाल यह है कि रेल का इंजन और सात डिब्बों वाली ट्रेन चलाने में फर्क है।
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48 डिग्री वाले सैकड़ों कर्व पर कैसे बढ़ेगी

नॉर्दर्न रेलवे चंडीगढ़-अंबाला रेल मार्ग पर तो स्पीड बढ़ा नहीं पाई, जहां महज 16 मोड़ और तीन डिग्री के तीन कर्व हैं। इस मार्ग पर शताब्दी भी करीब 40 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चंडीगढ़ से अंबाला पहुंचती है। अब कालका-शिमला मार्ग पर जहां सैकड़ों तीखे कर्व हैं, वहां स्पीड बढ़ाने की तैयारी चल रही है। कालका-शिमला 96 किलोमीटर लंबे रेल सेक्शन पर टॉय ट्रेन को कालका से शिमला पहुंचने में करीब 6 घंटे समय लगते हैं। रेलवे विभाग टॉय ट्रेन की स्पीड बढ़ाकर यह रास्ता 3 घंटे करने में जुटा है।

ऐसा करने पर भी सात डिब्बों वाली ट्रेन को चलाना संभव नहीं
रेलवे के अधिकारियों ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि ट्रेन की रफ्तार बढ़ाने के लिए ढाई फुट चौड़े नैरोगेज ट्रैक पर तीखे मोड़ खत्म करने होंगे, लेकिन हेरिटेज सेक्शन होने के कारण इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता। ऐसे में नई ब्रॉडगेज की चौड़ी रेल पटरी बिछाई जाए या फिर रेल कार की भांति एक या दो डिब्बों की ट्रेन चलाई जाए, तभी 35 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से ट्रेन चलाना संभव होगा। क्योंकि सिर्फ कालका से सोलन तक 393 कर्व हैं। इनमें 36, 45, 48 डिग्री के कर्व भी शामिल हैं, जहां स्पीड बढ़ाना संभव नहीं है।

 
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तारादेवी से जतोग के बीच कम डिग्री के कर्व

कालका-शिमला मार्ग पर तारादेवी से जगोत के बीच कम डिग्री के कर्व हैं। यहां कुछ जगह ट्रैक स्ट्रेट भी है। इस ट्रैक पर टॉय ट्रेन की स्पीड कुछ बढ़ाई जा सकती है। आरडीएसओ की टीम ने सबसे पहले यहां परीक्षण किया था। इस मार्ग पर 22 से 37 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से इंजन को दौड़ाया गया, लेकिन 37 पर जाते ही इंजन अप डाउन जर्क करने लगा।

डेढ़ हजार यात्री प्रतिदिन इस मार्ग पर करते हैं सफर
कालका-शिमला रेलमार्ग में 103 सुरंगें और 869 पुल बने हुए हैं। इस मार्ग पर 919 घुमाव आते हैं, जिनमें से सबसे तीखे मोड़ पर ट्रेन 48 डिग्री के कोण पर घूमती है। इस रेलमार्ग पर सामान्य सीजन में करीब डेढ़ हजार यात्री टॉय ट्रेन से सफर करते हैं, जबकि पीक सीजन में यह आंकड़ा दुगुना हो जाता है।
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