महाभारत के अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह तोड़ने की विधा इंडियन एयरफोर्स के पास है। चंडीगढ़ में एयरफोर्स डे पर अपनी सामरिक शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए भारतीय वायु सेना ने यह साबित कर दिया है कि युद्ध की हर परिस्थिति से निपटने में वह सक्षम है। चंडीगढ़ के आसमान में पहली बार दिखे इस तरह के नजारे ने कुछ समय के लिए पूरे शहर को रोमांचित कर दिया।
राष्ट्रपति के कार्यक्रम में मंच संचालिका ने यह साफ कर दिया कि महाभारत के अभिमन्यु के अलावा कर्ण, अर्जुन और नकुल जैसे योद्धा भी भारतीय वायुसेना के बेड़े में हैं। उन्होंने राफेल की तुलना अर्जुन से और तेजस को नकुल बताया। कर्ण जैसे युद्धकौशल के माहिर फ्लैंकर को कलाबाजियां करते देखकर सब दंग रह गए।
भीम जैसे भारी भरकम चिनूक की खूबी यह है कि वह 360 डिग्री के एंगल पर किसी भी तरफ घूम सकता है, हवा में टिल्ट हो सकता है और पानी की सतह से 30 फुट ऊपर स्थिर रह सकता है। दूर से आ रही आवाज से ही अहसास हो जाता है कि चिनूक आ रहा है। स्थिरता इतनी की पानी भी थर्रा उठा, ऐसे में दुश्मन का थर्राना लाजमी है। भीम जैसी ताकत वाला चिनूक तोप को लटका कर हवा में उड़ा तो दर्शकों को वायुसेना की शक्ति का अहसास हुआ।
तेजस की गर्जना से हुई हलचल
राष्ट्रपति के आगमन के साथ ही आसमान से तेजस अपनी तेजी के साथ निकला। तेजस की गर्जना के साथ ही लेक पर बैठे लोग खड़े हो गए और दूर तक निगाहें उसे तलाशती रहीं। फोटो खींचने के लिए मोबाइल आसमान की तरफ उठे तो लेकिन फोटो नहीं खींचे जा सके, क्योंकि तेजस की तेजी इतनी थी कि फोटो खींचने से पहले वह लुप्त हो गया।
जगुआर की आवाज आज भी सब पर भारी
इंडियन एयरफोर्स के बेड़े में एयरक्राफ्ट एक से एक हैं, लेकिन जगुआर की गर्जना आज भी सब पर भारी है। आसमान में होने वाली गड़गड़ाहट से ही युद्ध सा माहौल लगने लगता है। ऐसे में हवा में लट्टू की तरह नाचता जगुआर भी दर्शकों के लिए एक अलग ही अनुभव था।
मौसम ने भी दिया सुखना का पूरा साथ
बदला हुआ मौसम और सुखना लेक के किनारे का यह मनोहारी दृश्य इतिहास में दर्ज हो गया। आज मौसम भी इस आयोजन के साथ था। इसलिए लेक पर मौजूद दर्शकों को ज्यादा गर्मी नहीं लगी। जो गर्मी थी भी वह बार बार चिनूक की हवा से थरथराते पेड़ के पत्तों को देखकर ही गायब हो जाती थी।
डकोटा 1944 बनाम परशुराम
एयरफोर्स का सबसे पुराना और ताकतवर एयरक्राफ्ट है डकोटा। अपनी ताकत और स्थिरता के कारण परशुराम के नाम से मशहूर है। 1973 के युद्ध में भी इसके युद्धकौशल की वायुसेना साक्षी है। आज चंडीगढ़ की धरती डकोटा की उड़ान की गवाह बनी।