कटड़े के जन्म लेते ही यह पता चल जाएगा कि भैंस कितना दूध देगी। विश्वभर के वैज्ञानिकों को कड़ी चुनौती देते हुए भारत ने इस तकनीक को ईजाद कर लिया है। ऐसे में भैंस के जन्म से ही उसकी मादा संतान के दूध के बारे में बताने वाला भारत विश्व का पहला देश बन जाएगा।
इससे पहले इसी तकनीक से अमेरिका, यूरोपियन व आस्ट्रेलिया में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहे है, लेकिन वहां पर बैलों से गाय इस तकनीक से पैदा हो रही हैं। इस तकनीक को नाम दिया गया है डीएनए मार्क्स।
विश्व में 26 यूरोपियन कंट्री मिलकर इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं और भारत की ओर से राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर) के प्रिंसिपल वैज्ञानिक रमेश कुमार विज ने इस कार्य को 7 साल की कड़ी मेहनत और रिसर्च के बाद कर दिखाया है।
मई के मध्य में इसकी विधिवत रूप से घोषणा कर दी जाएगी। एनबीएजीआर में चल रहे सार्क देशों (भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान, बंगलादेश, मालद्वीप व श्रीलंका) के प्रतिनिधियों के चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम के पांचवें दिन उन्हें इस तकनीक के बारे में जानकारी दी गई।
आठ वर्षों का इंतजार खत्म, ढाई साल में तैयार होंगी उच्च नस्लें
डीएनए मार्क्स तकनीक से अब करीब पांच वर्षों की बचत होगी। दरअसल पहले कटड़े से भैंस तैयार होती थी और भैंस के दूध से पता चलता था कि कटड़े की भैंस कितना दूध देगी। इस प्रक्रिया में करीब 8 साल का समय लग जाता है। नई तकनीक से कटड़े के जन्म लेते ही पता चल जाएगा कि उसकी मादा संतान कितना दूध देगी।
ऐसे में 5 साल का समय बचेगा। इसके साथ ही हमें उच्च नस्ल की भैंस शुरुआत में ही मिल जाएंगी। इससे आर्थिक नुकसान नहीं होगा। अभी तक कटड़े से भैंस तैयार होती है।
उस भैंस का दूध देखकर उससे तैयार कटड़ी से दूध लिया जाता है। जब तक कटडे़े से भैंस और भैंस से कटड़ी तैयार होती है और नस्ल का पता चलता है कटड़ा अंतिम अवस्था में होता है।
सात साल की रिसर्च ने दिलाई सफलता
डॉ. विज ने इस प्रोजेक्ट को साल 2007 में प्रेजेंट किया। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। तब विश्व बैंक ने इसके लिए 14 करोड़ दिए। पूना में आईसीआर के 7 प्रोजेक्ट में से यह सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था।
डॉ. विज के साथ पूना के बायफ इंस्टीट्यूट से डॉ. सुरेश गोखले व करीब 900 सदस्यीय टीम ने इस प्रोजेक्ट पर काम किया। प्रतिनिधित्व डॉ. विज ने किया। फील्ड से सीमन पूने की आईएसओ सर्टिफाइड लैब में रखा गया और उसे फिर बांटा गया। अब तक इस तकनीक से साढ़े 12 लाख मार्क्स पर काम किया जा चुका है।
यूपी के 52 जिलों पर हुई शोध
प्रोजेक्ट के तहत यूपी के 52 जिलों में काम शुरू किया गया था। 12 कटड़ों से 15 हजार कटड़ियां पैदा की गईं। उनके डीएनए मार्क्स से सत्यापित किया गया कि वह उन्हीं की कटड़िया हैं।
इंडिया और फ्रांस में हुआ जोनमिक समझौता
इंडिया और फ्रांस में जोनमिक समझौता जो दिल्ली में हुआ। उसमें जब फ्रांस को इस तकनीक के बारे में बताया गया तो उन्होंने भी आश्चर्य जता दिया। उसकी लीड भी भारत की ओर से आरके विज ने की।
पेरेंट्स वैरीफिकेशन किट के लिए मिला नेशनल अवार्ड
डॉ. आरके विज ने इससे पहले कटड़ा, कटड़ी, बछड़ा, बछड़ी का जन्मदाता कौन है वाली पेरेंट्स किट साल 2013 में ईजात की थी। इसके लिए उन्हें 11 मई को राष्ट्रपति ने दिल्ली में नेशनल अवार्ड देकर सम्मानित किया था।
विदेशी तकनीक नहीं आ सकी काम
पहले भारत ने सोचा था कि जहां तक विदेशियों ने काम कर लिया है। अब भारत वहीं से आगे शुरू कर ले। विदेशियों ने 54 हजार मार्क्स पर काम किया था, लेकिन रिसर्च में पाया गया कि उनमें से केवल 1800 ही भारत के योग्य हैं। ऐसे में डॉ. विज ने खुद नए सिरे से इस पर रिसर्च करने की ठान ली और अब इसे 95 प्रतिशत तक पूरा किया जा चुका है।
दूध की मात्रा में इजाफा होगा। इससे हमें अब आठ वर्षों तक उच्च नस्लों के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इससे समय के साथ आर्थिक बचत होनी भी तय है। इस तकनीक के इजात के बाद हम विदेशियों से जहां 50 साल पीछे थे अब केवल 5 साल पीछे रह गए हैं। मई माह में इस तकनीक को लांच कर दिया जाने की पूर्ण संभावना है।
आरके विज, पि्रंसिपल साइंटिस्ट, एनबीएजीआर, करनाल