किसान आंदोलन अब समाप्त हो गया है। सरकार से सभी मांगों पर लिखित सहमति मिलने के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने इसकी औपचारिक घोषणा कर दी। सबसे लंबे आंदोलनों में शामिल इस प्रदर्शन से सबसे ज्यादा असर पंजाब की राजनीति पर पड़ेगा। पंजाब में कुछ ही समय बाद विधानसभा चुनाव हैं। ऐसे में किसान आंदोलन से पंजाब को कुछ ऐसे चेहरे मिले हैं जो प्रदेश की राजनीति पर असर डालेंगे। ये वो किसान हैं, जिन्होंने महीनों बिना मौसम की परवाह किए अपने हक की लड़ाई लड़ी। इस आंदोलन से पंजाब के ग्रामीण इलाकों से एक नई तरफ की जागरूकता आई। एक तरह से सोनीपत में बॉर्डर पर चल रहे मोर्चे राजनीति की पाठशाला बने।
किसान आंदोलन से लोगों में अपने अधिकारों व देश की राजनीति को लेकर समझ बढ़ी है। पंजाब के लोगों के असली हीरो के रूप में भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) के प्रदेश प्रधान जोगिंदर सिंह उगराहां, डॉ. दर्शन पाल मिले। इन सभी ने दिल्ली के बॉर्डरों पर करीब एक साल से शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन चलाकर केंद्र सरकार को झुका दिया। इससे साबित हुआ है कि शांतिपूर्ण आंदोलन से चमत्कार किए जा सकते हैं।
पंजाबी यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर जसविंदर सिंह बराड़ के मुताबिक इस आंदोलन के बाद अब पंजाब व हरियाणा के अलावा देश के अन्य राज्यों के किसानों में भी एमएसपी के महत्व के बारे में जागरूकता आ गई है। इसलिए अब अन्य राज्यों से भी एमएसपी देने की मांग उठ रही है। साथ ही अब पूरी उम्मीद है कि पंजाब व हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियां गेहूं व धान के अलावा फल व सब्जियों पर भी एमएसपी देने के वादे को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करें। क्योंकि एमएसपी मिलने से किसान गेहूं व धान की परंपरागत खेती चक्र से बाहर निकल सकेंगे। साथ ही इससे खेती व्यवसाय को भी फायदा होगा।