पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उन सभी आंकड़ों को तलब किया है, जिस सर्वे के आधार पर हरियाणा में जाटों समेत छह जातियों को प्रदेश सरकार ने आरक्षण दिया है।
बुधवार को मामले में सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की तरफ से आरक्षण पर लगी रोक हटाने के लिए दाखिल अर्जी पर अपनी दलीलें पूरी कर लीं गईं, लेकिन हाईकोर्ट ने जाट आरक्षण को लेकर हरियाणा सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया। जस्टिस एसएस सारों और जस्टिस लीजा गिल की खंडपीठ ने सरकार की दलीलें सुनते हुए सवाल किया कि सरकार को ऐसी भी क्या जल्दी थी कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करने से पहले ही एक्ट बनाकर आरक्षण लागू कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि उचित ढंग से आयोग का गठन करने के बाद उसकी रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण का प्रावधान किया जा सकता था। कोर्ट ने हरियाणा सरकार से पूछा कि जाटों समेत छह जातियों को किन आंकड़ों के आधार पर आरक्षण लाभ दिया गया। कोर्ट ने सरकार को मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को वह सभी आंकड़े पेश करने के निर्देश जारी किए। कोर्ट ने फिलहाल जाट आरक्षण पर लगाई अंतरिम रोक को बरकरार रखा है। अब अगली सुनवाई पर याची और इस मामले में अन्य पक्ष कोर्ट के सामने अपना अपना पक्ष रखेंगे।
एक और याचिका दायर, सर्वे पर उठाए सवाल :
बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में एक अन्य याचिका भी दाखिल हुई, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने एमडीयू रोहतक को नोटिस जारी कर उस सर्वें का रिकार्ड तलब किया, जिसके सर्वे रिपोर्ट को आधार बनाकर केसी गुप्ता कमेटी ने जाटों को आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की थी। केसी गुप्ता कमेटी की सिफारिशों पर ही हरियाणा सरकार ने जाटों समेत छह जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग के रूप में आरक्षण दे दिया था। कोर्ट में याचिका की पैरवी कर रहे एडवोकेट आरके चोपड़ा ने कहा कि एमडीयू की तरफ से सर्वें कराए जाने की जो बात की गई है, वह कभी हुआ ही नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि सर्वे में जो आंकड़े पेश किए गए, उसमें केवल उन गांवों का उल्लेख किया गया, जो बहुत पिछड़े हैं। समृद्ध गांवों का सर्वें में कोई जिक्त्रस् नहीं है।
सरकार ने दलील में दिया इंदिरा साहनी और राम सिंह केस का हवाला
जाट आरक्षण
- फोटो : amar ujala
इससे पहले, बुधवार को हाईकोर्ट में जाट आरक्षण मामले पर सुनवाई शुरू होते ही हरियाणा सरकार की ओर से अपनी दलीलों को आगे बढ़ाया गया। सरकार ने इंदिरा साहनी केस और राम सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दिए आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि 25 नवंबर, 2010 को एनसीबीसी (नेशनल कमिशन फॉर बैकवर्ड क्लास) इस मुद्दे पर नकारात्मक रिपोर्ट दे चुका है, लेकिन इसके बाद यूपी, एमपी, राजस्थान में बने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोगों ने आरक्षण का पक्ष लिया। सरकार की ओर से दलील दी गई कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोगों के लिए यह बाध्यता नहीं है कि वे एनसीबीसी के फैसलों का अनुसरण करे।
याची को कमीशन के पास जाना चाहिए :
इसके साथ ही, 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण को गलत करार देने की याची की दलील पर भी हरियाणा सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश में कह चुका है कि अति विशेष परिस्थितियों में कुछ निर्धारित प्रक्रिया को पूरा कर आरक्षण को 50 प्रतिशत से ऊपर ले जाया जा सकता है। इसके साथ ही हरियाणा सरकार की ओर से दलील दी गई कि इस मामले में याची को हाईकोर्ट में आने के स्थान पर सरकार द्वारा बनाए गए कमीशन के पास जाना चाहिए, क्योंकि कमीशन के पास प्रावधान किया गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी जाति विशेष को दिए गए आरक्षण के खिलाफ शिकायत दे सकता है। साथ ही कमीशन उस पर फैसला लेगा। इस कमीशन का चेयरमैन रिटायर्ड जज को बनाया गया है।
हरियाणा सरकार ने केसी गुप्ता आयोग को लेकर अपनी दलीलों में कहा कि आयोग की रिपोर्ट को सिरे से खारिज नहीं किया गया है। सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप ही डाटा एकत्रित कर आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इस पर हाईकोर्ट ने पूछा कि डाटा कब और कैसे तैयार किया गया। हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई पर आरक्षण के लिए एकत्रित डाटा सौंपने के निर्देश दिए।