चंडीगढ़ में लावारिस कुत्तों के आतंक पर आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए यूटी प्रशासन से इस बाबत तैयार की गई नीति अदालत में पेश करने को कहा है।
हालांकि इससे पहले शहर में लावारिस कुत्तों के आतंक को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने प्रशासन को ठोस नीति बनाने का निर्देश भी दिया था। लेकिन लंबे समय तक प्रशासन इसके बारे में खामोशी साधे रहा।
अब हाईकोर्ट ने मामले को स्वत: संज्ञान लेकर यूटी प्रशासन से नीति पर रिपोर्ट तलब कर ली है। मामले की अगली सुनवाई 15 मई को होगी।
वीरवार को सुनवाई के दौरान जवाब देने में असमर्थता जताते हुए यूटी प्रशासन ने सुनवाई टालने की गुहार लगाई थी। शुक्रवार को जब इस मामले में फिर सुनवाई शुरू हुई तो प्रशासन के वकील ने जस्टिस राजन गुप्ता की एकल बेंच के समक्ष तथ्य पेश किया कि शहर में लावारिस कुत्तों पर लगाम लगाने के लिए पुख्ता कदम उठाए जा रहे हैं।
कुत्तों की नसबंदी की जा रही है और पंजीकरण जरूरी किया गया है। बगैर पंजीकरण के कारण कुत्तों के मालिकों के चालान काटे जाते हैं और लावारिस कुत्तों को पकड़कर डाग शेल्टर में डाला जाता है।
इसके साथ ही प्रशासन से वकील ने अदालत से यहां तक कह डाला कि बगैर भड़काए कुत्ते किसी को नहीं काटते, लिहाजा आम व्यक्ति को जागरूक करने की जरूरत है। हाईकोर्ट ने प्रशासन के इस तर्क पर कहा कि इसका सीधा मतलब है कि प्रशासन लावारिस कुत्तों पर लगाम लगाने में असमर्थ है।
इसी दौरान याचिकाकर्ता के वकील कुनाल मुगलानी ने हाईकोर्ट के समक्ष तथ्य रखा कि लावारिस कुत्तों के मामले में हाईकोर्ट ठोस नीति बनाने का निर्देश दे चुका है। इस पर प्रशासन ने कहा कि नीति बना ली गई है और इसके प्रावधानों को लागू किया जा रहा है।
बेंच ने प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करने को कहते हुए 15 मई तक अदालत में जानकारी पेश करने को कहा कि क्या प्रावधान लागू किए जा चुके हैं और कौन से प्रावधान लागू किए जाने हैं।
कोर्ट को बताया मुफ्त दवाएं देते हैं
एडवोकेट मुगलानी के मुताबिक, नीति के प्रावधानों में हालांकि मुआवजे की व्यवस्था नहीं है, लेकिन मुफ्त दवाएं, कुत्तों की नसबंदी और कुत्तों की देखरेख की व्यवस्था है। उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट ने प्रशासन के समक्ष सवाल खड़ा किया था कि क्या कुत्तों के काटने पर पीड़ितों को मुआवजे की व्यवस्था है या नहीं।