बुधवार के हंगामे के बाद पार्टी तंवर से नाराज है। सूत्रों के अनुसार चुनाव के दौरान तंवर को उनके हाल पर छोड़ने का निर्णय लिया गया है। साथ ही प्रदेश में 90 सीटों पर अब यह नजर रखी जाएगी कि तंवर समर्थक किन-किन सीटों पर बगावत कर पार्टी उम्मीदवार को नुकसान पहुंचाते हैं। इसकी पूरी रिपोर्ट भी पार्टी के पर्यवेक्षक तैयार करेंगे।
2015 से बढ़ी हुड्डा के साथ ज्यादा खटास
2014 में लोकसभा चुनाव के टिकट वितरण के दौरान हुड्डा व तंवर के बीच मतभेद गहरा गए थे। दोनों के रिश्तों में इसके बाद खटास बढ़ती गई। सितंबर 2015 में दिल्ली में हुई कांग्रेस की किसान रैली में तंवर के साथ मारपीट हुई। आरोप हुड्डा समर्थकों पर लगा। तंवर की गर्दन में भी चोट आई। इसकी शिकायत हाईकमान से हुई।
पूरे मामले की जांच के लिए शिंदे कमेटी बनी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिससे हुड्डा के खिलाफ तंवर का आक्रोश और बढ़ गया। दूसरी और हुड्डा समर्थक विधायकों ने तंवर को हटाने की मुहिम तेज कर दी। हालांकि, इसमें उन्हें लंबा समय लग गया और संगठन में बदलाव विधानसभा चुनाव से ऐन पहले हुआ। अध्यक्ष पद से हटने के बाद से ही तंवर अपनी राहें हुड्डा, सैलजा व पार्टी से जुदा किए हुए हैं। अब उन्होंने इस्तीफों का दांव चल दिया है। देखना है तंवर की लड़ाई कब तक जारी रहती है।