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हाथी की चाल, ऑटो की रफ्तार, झाड़ू के चमत्कार को ‘जन आशीर्वाद’ की दरकार

Thu, 24 Oct 2019 01:17 AM IST
ajay kumar मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़
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haryana Assembly elections - फोटो : अमर उजाला
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हरियाणा विधानसभा के रण में सत्ता की ललक पाले लड़ रहे कुछ सियासी दल ऐसे भी हैं, जिन्हें अपने उज्जवल भविष्य के लिए ‘जन आशीर्वाद’ की मजबूती से दरकार है। इन दलों को यदि मतदाताओं का आशीर्वाद मिला, तभी ये दल आगे की चुनौतियों को पार पाने में सक्षम बन पाएंगे, वरना सियासी चुनौतियां इनके समक्ष पहाड़ सी बन जाएंगी। 

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इसी के मद्देनजर हरियाणा विधानसभा चुनाव में इन दलों ने जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया। कई सीटों पर तो इन दलों के प्रत्याशियों ने खूब मेहनत भी की। खैर, इनकी मेहनत का परिणाम गुरुवार को मतगणना के बाद सामने आ जाएगा। इन दलों के लिए जीत-हार तो बाद की बात रहेगी, लेकिन कुछेक सीटों पर इन दलों के प्रत्याशी बड़ी पार्टियों का खेल जरूर बिगाड़ सकते हैं।

इस चुनावी समर में भाजपा, कांग्रेस, जजपा और इनेलो के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा), लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी (लोसुपा), आम आदमी पार्टी (आप), शिरोमणी अकाली दल(शिअद), लोक स्वराज पार्टी के अलावा कुछ अन्य छोटे दलों ने भी सत्ता के लिए जंग लड़ी। लेकिन ये दल सभी 90 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी नहीं उतार पाए। 

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बावजूद इसके इन दलों के नेताओं ने खूब दावे किए इन चुनाव में वे मजबूती से उभरकर आएंगे और सत्ता में अपना पूरा दखल रखेंगे। इन दावों में कितना दम था, बसपा के हाथी की चाल और लोसुपा के आटो की रफ्तार कैसी रही व ‘आप’ के झाड़ू ने क्या चमत्कार किया, आज के नतीजें यह तय कर देंगे।

इन दलों के अलावा 375 आजाद प्रत्याशियों ने भी इस चुनावी जंग में हुंकार भरी है। इनमें से कई प्रत्याशी तो ऐसे हैं, जो भाजपा और कांग्रेस की टिकट के चाहवान थे, मगर जब दोनों पार्टियों ने इनकी टिकट काटी, तो बागी होकर ये प्रत्याशी बतौर आजाद ही मैदान में उतर गए। इन्हीं बागी आजाद प्रत्याशियों ने कुल नब्बे में से पच्चीस से अधिक सीटों पर मुकाबला रोमांचक बनाया। 

इस बार नतीजे इन बागी आजाद प्रत्याशियों के लिए कुछ भी रहें, मगर ये प्रत्याशी भाजपा और कांग्रेस का गेम बिगाड़ने का माद्दा जरूर रखते हैं। खैर, इनकी बगावत क्या गुल खिलाएगी, यह तस्वीर भी आज मतगणना के बाद साफ हो जाएगी। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में यदि देखें तो 5 सीटों पर आजाद प्रत्याशी जीते थे।

बसपा को ग्राफ बढ़ाने, प्रत्याशी जितवाने की चाहत
हरियाणा में चुनाव चाहें लोकसभा के हों या विधानसभा के बहुजन समाज पार्टी ने अपनी भागेदारी जरूर दर्ज की है। बसपा ने इस विधानसभा चुनाव में भी 87 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे। जबकि चुनाव से पहले लोसुपा, इनेलो और जजपा तीनों से किया अपना गठबंधन एक के बाद एक तोड़कर अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला किया। 

वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा ने कुल वोट प्रतिशत का 4.4 प्रतिशत हासिल कर अपना 1 विधायक जितवाया था। मई 2019 के लोकसभा चुनाव में भी देखें तो बसपा ने लोसुपा के साथ गठबंधन कर सभी दस लोकसभा सीटों पर संयुक्त प्रत्याशी उतारे थे। 

लोकसभा में भले ही इस गठबंधन को एक सीट न मिली हो, लेकिन भाजपा और कांग्रेस के बाद बसपा-लोसुपा गठबंधन ही तीसरे स्थान पर था। अब इस विधानसभा चुनाव में फिलहाल हाथी का साथी तो कोई नहीं है, लेकिन फिर बसपा अपना ग्राफ बढ़ाते हुए अपने प्रत्याशी भी जितवाना चाहती है। भविष्य क्या रहेगा, नतीजें बताएंगे।

लोसुपा को चाहिए जीत की संजीवनी
हरियाणा में पिछड़ों की राजनीति कर रही भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी की पार्टी लोसुपा को ‘संजीवनी’ की दरकार है। पहली बार इस पार्टी ने अकेले विधानसभा चुनाव लड़ा है। लोसुपा का मई 2019 के लोकसभा में बिना सीट जीते बसपा के साथ प्रदर्शन कुछ हद तक ठीक रहा था। लेकिन इस बार लोसुपा मैदान में अकेली है।  

लोसुपा सुप्रीमो राजकुमार सैनी ने जीत के लिए फील्ड में एड़ी चोटी का जोर लगाया है, जबकि वे खुद भी गोहाना सीट से प्रत्याशी है। प्रदेश में पिछड़ों का झंडा बुलंद कर चल रहे सैनी को अब हर हाल में कुछ प्रत्याशियों की जीत चाहिए, ताकि पार्टी का वजूद भी बचा रहे और आगे के लिए भी संभावनाएं बनी रहे।
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बिना केजरी ‘आप’ के दिल्ली मॉडल को लग सकता है झटका

आम आदमी पार्टी ने हरियाणा विधानसभा का चुनाव प्रदेशाध्यक्ष नवीन जयहिंद के नेतृत्व लड़ा। जयहिंद चेहरा थे और विकास मॉडल ‘दिल्ली’ था। आप ने सभी सीटों की बजाए 46 सीटों पर ही चुनाव लड़ा। चुनाव प्रचार की कमान भी प्रदेशाध्यक्ष नवीन जयहिंद ने ही संभाली। 

व्यस्तता के चलते दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल प्रचार के लिए हरियाणा नहीं आ पाए। फरसा हाथ में ले नवीन जयहिंद ही भाजपा को घेरते हुए फील्ड में अपने प्रत्याशियों की जीत के लिए पसीना बहाते दिखे। प्रत्याशियों को अरविंद केजरीवाल की कमी जरूर खली। मगर जयहिंद ने जैसे-तैसे उत्साह बनाए रखा। अब देखना यह है कि बिना केजरीवाल के हरियाणा में आप की नैय्या पार लगती है या नहीं।

शिअद को ‘वजूद’ के लिए जीतना होगा
शिरोमणी अकाली दल (शिअद) को हरियाणा में अपना वजूद कायम रखने के लिए जीतना होगा। भाजपा की ओर से दूरी बना लेने के बाद शिअद ने हरियाणा में अपने पुराने साथ इनेलो के साथ चुनाव लड़ा।

दोनों दलों ने मिलकर सिर्फ 81 सीटों पर ही प्रत्याशी उतारे। जिसमें से अधिकतर प्रत्याशी इनेलो के ही थे। शिअद ने वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में 0.6 प्रतिशत वोट लेते हुए अपना 1 विधायक भी जितवाया था। अब भी शिअद चाहती है कि कम से कम उनका एक विधायक तो जीते। ताकि हरियाणा में उनका वजूद बचा रहे।
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