लोकसभा चुनाव के बाद अब विधानसभा चुनाव में जीत के लिए भाजपा को ‘मोदी’ संजीवनी की जरूरत है। उपचुनाव परिणाम से साफ हो गया है कि मोदी के प्रचार मैदान में नहीं उतरने से पार्टी को जबरदस्त नुकसान झेलना पड़ा।
विधानसभा चुनाव में एक माह से भी कम समय बचा है। ऐसे में यदि मोदी हरियाणा में चुनाव प्रचार के लिए नहीं आते तो पार्टी के लिए परेशानी खड़ी हो सकती हैं।
लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर ने इस तरह से काम किया कि चुनाव प्रचार में मोदी छाए रहे। ताबड़तोड़ रैलियां, नुक्कड़ सभाएं, नमो टी स्टाल पर चर्चा आदि के जरिये उन्होंने हर मतदाता से जुड़ने की कोशिश की।
भाजपा की यही अटैकिंग रणनीति रंग लाई और भाजपा गठबंधन तीन सौ से अधिक सीटें लाकर केंद्र में अपनी सरकार बना गई। यही जादू दूसरे दलों को लोकसभा चुनावों में उड़ाकर ले गया।
भाजपा के लिए इम्तिहान का वक्त
यही कारण रहा कि अंबाला में जहां भाजपा रिकार्ड मतों से जीत दर्ज कर गई, वहीं प्रदेश में दस में से सात सीटों पर कब्जा भी किया। राजनीतिक जानकारों की मानें, तो उपचुनाव में नरेंद्र मोदी ने प्रचार अभियान में भाग नहीं लिया, जिसके चलते पार्टी मतदाताओं से दूर हो गई।
भाजपा में चर्चा है कि यदि मोदी हरियाणा में चुनाव प्रचार के लिए रैलियां आदि नहीं करते, तो ऐसी स्थिति में हरियाणा प्रदेश भाजपा के माथे पर भी चिंता की लकीरें खिंच सकती हैं।
वर्ष 1967 से लेकर 2009 तक हुए चुनावों में आंकड़े कभी भाजपा के पक्ष में नहीं रहे हैं। आंकड़ों पर नजर मारें, तो भाजपा अपने बैनर के तले कभी भी अपने दम पर ऐसी स्थिति में नहीं दिखी है कि वह सरकार बना सके।
हां, गठबंधन या समर्थन के साथ भाजपा ने सत्ता का सुख जरूर भोगा है। अब भाजपा के लिए यह इम्तिहान का वक्त है, क्योंकि इस बार विस चुनावों में भाजपा को मोदी संजीवन का सहारा लेना पड़ेगा।