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शहीद दिवस: पढ़ें भगत सिंह की भांजी गुरजीत कौर का आलेख, 'यह मेरे शहीद-ए-आजम के सपनों का भारत नहीं है'

Wed, 23 Mar 2022 01:43 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

आज भी देश के मजदूर-किसान, जो इस दुनिया की सुई से लेकर जहाज तक, अनाज से लेकर कपास तक सारी सुख-सुविधा पैदा करते हैं, वे ही बदहाली की जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं।
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गुरजीत कौर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसे फांसी पर लटकाया जाना हो और चंद घंटे पहले वह मुस्कुरा रहा हो। मेरे भगत सिंह ऐसे ही थे, फांसी से चंद घंटे पहले अपने दोस्तों को खत लिख रहे थे... अब मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है। इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊंचा मैं हरगिज नहीं हो सकता। 

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आज मेरी कमजोरियां जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फांसी से बच गया तो वे जाहिर हो जाएंगी और क्रांति का प्रतीक चिह्न मद्धिम पड़ जाएगा। ऐसा भी हो सकता है मिट ही जाए लेकिन दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और आज हर तरफ भगत सिंह की दीवानगी युवाओं के सिर चढ़कर बोल रही है। 

यानी वह आज भी युवाओं के बीच जिंदा है, उसकी दिलेरी व बहादुरी की मशाल आज भी जल रही है लेकिन क्या भगत सिंह ने फांसी पर चढ़ने से पहले ऐसा सोचा था कि जिस देश के लिए मैं कुर्बान हो रहा हूं, वह 70 साल बाद ऐसा होगा। अमीरी व गरीबी के बीच इतना अंतर आ जाएगा। युवा नशे की दलदल में धंस जाएगा ?

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जहां एक तरफ पूरा देश उनकी फांसी पर रो रहा था। वहीं भगत सिंह मुस्करा रहे थे। फांसी का वह पल इतना भयानक था कि लाहौर जेल में बंद सभी कैदियों की आंखें नम हो गई थीं। शहीद भगत सिंह ने कभी सपने में नहीं सोचा होगा कि उनका भारत 70 साल बाद ऐसा होगा। असली आजादी तो तब है जब देश के मजदूरों, गरीब किसानों, नौजवानों, महिलाओं व हरेक दबे-कुचले वर्ग को हर प्रकार के शोषण से आजादी मिले। 

मतलब मेहनत करने वाले लोगों को उनकी मेहनत का पूरा हक मिले लेकिन आज समाज में महंगाई, बेरोजगारी व गैर-बराबरी देख कर कह सकते हैं कि आजादी के 70 साल बाद भी भगत सिंह का सपना अधूरा है। आज भी देश के मजदूर-किसान, जो इस दुनिया की सुई से लेकर जहाज तक, अनाज से लेकर कपास तक सारी सुख-सुविधा पैदा करते हैं, वे ही बदहाली की जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं।

हर साल हजारों गरीब किसान कर्ज के बोझ के कारण आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं। शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी है, मौजूदा समय में बेरोजगारी के कारण युवा हताश व निराश हैं। वहीं, नेता-मंत्री मेहनतकशों की कमाई पर ऐश करते हैं। भगत सिंह ने मार्च 1926 में नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। 

1928 में उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन कर दिया था। इन संगठनों के नाम से ही आप ये समझ सकते हैं कि भगत सिंह के विचारों में सिर्फ आजाद भारत के लिए ही जगह थी। भगत सिंह का सपना था कि हम अपनी धार्मिक पहचान के बजाय अपनी भारतीय पहचान को महत्व दें, क्या हम उस पर सही उतर रहे हैं ? भगत सिंह तो आजादी को राजनीतिक बंधनों तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि उनका मानना था कि आर्थिक और सामाजिक आजादी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। 

शोषण, अन्याय, असमानता, अंधविश्वास और अज्ञानता से मुक्त समाज व देश ही भगत सिंह का सपना था। भगत सिंह ऐसे भारत की कल्पना करते थे, जहां लोगों के बीच आपसी भाईचारा हो, वह सांप्रदायिक दंगों की मानसिकता को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे। भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद तो हो गया लेकिन उन्होंने जिस भारत का सपना देखा था, वैसा हमारा देश आज भी बनने के लिए संघर्ष कर रहा है। लेखिका गुरजीत कौर शहीद भगत सिंह की बहन प्रकाश कौर की बेटी हैं
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