एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड के अनुसार पीने के पानी में यूरेनियम की मात्रा 60 पीपीबी से अधिक नहीं होनी चाहिए लेकिन बठिंडा जिले के पानी में यह मात्रा 10 गुना से अधिक 684 पीपीबी आंकी गई थी। ऐसे में इस पानी को पीने के लिए ठीक नहीं माना गया था। इसके बाद से ही लगातार हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई हो रही थी और सरकार लोगों को स्वच्छ पानी उपलब्ध करवाने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में जानकारी दे रही थी।
एक फरवरी को सुनवाई के दौरान इस मामले में अदालत का सहयोग कर रहे सीनियर एडवोकेट रुपिंदर सिंह खोसला ने हाईकोर्ट को बताया कि पीने के पानी में यूरेनियम की समस्या की जांच अभी तक केवल मालवा तक सीमित रखी गई है। बाकी के दो क्षेत्रों में भी इसकी जांच करवाई जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने इस सुझाव को बेहद अहम मानते हुए अब भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर को दोआबा और माझा के एक-एक जिले में जांच कर रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है।
बठिंडा के लिए सुझाव
सुनवाई के दौरान खोसला ने हाईकोर्ट को बताया कि थर्मल प्लांट बंद होने के बाद वहां के लिए जल का माध्यम रही झीलों का अभी कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा है। यहां पर पानी भाखड़ा नहर से आता है और इसकी सप्लाई बठिंडा के लोगों को स्वच्छ जल के माध्यम के तौर पर की जा सकती है। बठिंडा कंटोनमेंट में भी भाखड़ा से ही पानी की सप्लाई हो रही है।