रोहतक पीजीआईएमएस के पीसीसीएम विभागाध्यक्ष, कोविड के प्रदेश के प्रमुख नोडल अधिकारी एवं कोवैक्सीन रिसर्च के को-इंवेस्टिगेटर डॉ. ध्रुव चौधरी ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि हम सभी चाहते हैं कि कोवैकसीन ह्यूमन ट्रायल में सफल हो। इससे कोरोना के संक्रमण से हम लोगों को बचा पाएंगे। लेकिन अभी इस ट्रायल पर कुछ कह पाना संभव नहीं है, क्योंकि पहले फेज में 20 वालंटियरों को डोज दी जा चुकी है।
इसमें यदि कोई समस्या नहीं आती तो दूसरा फेज शुरू होगा। जिन वालंटियर को पहली डोज दी गई हैं, उनकी दो सप्ताह पूरे होने पर जांच की जाएगी। इस रिसर्च में वैक्सीन के वालंटियर को दो शॉट लगने हैं। पहले शॉट के बाद सभी वालंटियरों की स्क्रीनिंग होगी, इसके बाद जो रिपोर्ट आएगी उसके बाद तय होगा कि आगे क्या करना है। दूसरा फेज अधिक केयरफुल होकर करना होता है। हमें देखना होता है कि व्यक्ति को रिएक्शन तो नहीं हो रहा और जांच में पता किया जाता है कि उसके अंदर एंटी बाडी बनने की क्या स्थिति है।
जीरो, तीन, छह लेवल की होती है दवा
डॉ. ध्रुव बताते हैं कि कोवैक्सीन की डोज के बारे में डॉक्टर को भी पता नहीं होता कि वह वालंटियर को क्या दे रहे हैं। इसमें जीरो, तीन व छह लेवल की दवा हो सकती है। रिसर्च में यह इसलिए किया जाता है कि सच्चाई का पता चल सके। कोडिंग के आधार पर सारी जांच होती है। वैक्सीन भेजने वाले को ही पता होती है कि वह किसमें क्या भेज रहे हैं। इसलिए रिसर्च को डबल ब्लाइंड कहा जाता है। यहां सारा काम कोड पर होता है। जारी गाइडलाइन के अनुसार कंट्रोल के साथ सब देखा जाता है। दूसरे चरण में अलग-अलग चीजें देखनी होती हैं और हर चीज पर अधिक ध्यान रखना होता है।