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Stubble Burning: शौक से पराली नहीं जलाता किसान, लाचारी है बड़ी वजह, महंगी मशीनरी खरीदना सबके बस की बात नहीं

Fri, 04 Nov 2022 02:00 PM IST
निवेदिता वर्मा सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)

सार

क्रांतिकारी किसान यूनियन के प्रधान डॉ. दर्शन पाल का कहना है कि पराली जलाना हमारा शौक नहीं है। किसानों की मजबूरी यह है कि अगली फसल की तैयारी के लिए समय कम होता है, तो दूसरी तरफ पराली को इकट्ठा करने में खर्चा भी आता है।
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पंजाब में जल रही पराली। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
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विस्तार
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पराली जलाने के मसले पर पंजाब के किसान एक बार फिर दिल्ली वालों के निशाने पर हैं। पराली जलाना किसान का शौक नहीं है, उनका तर्क है कि जो काम माचिस की एक तीली से होता हो उसके लिए हम पैसा क्यों लगाएं? हम बेबस हैं।
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पंजाब में 80 फीसदी किसान पांच एकड़ से कम जमीन वाले हैं, वह तीन लाख रुपये का ट्रैक्टर व मशीनरी कैसे खरीद सकते हैं। सात दिन का समय होता है, धान की कटाई व गेहूं की बिजाई में, क्या सात दिन में पराली को ठिकाने लगाना संभव है। 

किसान क्यों हैं मजबूर
1- किसानों को पराली प्रबंधन के लिए 2 हजार रुपये प्रति एकड़ जेब से खर्च करने पड़ते हैं किसान पैसा नहीं खर्च करते हैं क्योंकि अधिकतर छोटे किसान जमीन को ठेके पर लेकर खेती करते हैं। 
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2- एक नवंबर से सात नवंबर के बीच गेहूं की बिजाई पर अच्छी फसल तैयार होती है, यह कई शोधों में साफ हो चुका है। सात दिन में खेतों से पराली को उठाना काफी मुश्किल है।
3- अगर पराली न जलाई जाए तो खेतों में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और खेतों में ट्रैक्टर से जुताई में कई गुणा समय लगता है।
4- अगर पराली को खेतों से साफ न किया जाए तो गेहूं में सूंड़ी पड़ने का खतरा होता है।
5- सरकार जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं करती। दो मशीनों को पांच-पांच गांवों को दिया जाता है, जो सात दिन में पराली को खत्म नहीं कर सकती। उसको भी बड़े किसान इस्तेमाल करते हैं जबकि 80 फीसदी छोटे किसान हैं।



पराली नष्ट करने का काम सरकारी खर्चे पर हो
गांव महल कलां के किसान करणपाल सिंह का कहना है कि पराली की जड़ काटने के काम को जब तक मनरेगा के तहत नहीं लाया जाएगा, इसका समाधान नहीं हो सकता। क्योंकि तंगहाल जिंदगी जी रहे किसान को कोई काम अगर फ्री में करने को मिलेगा तो उसके लिए वह पैसा नहीं खर्च करेगा। सरकार को यदि वास्तव में पराली जलने से रोकना है तो डंडे से काम लेना बंद करे। किसान संगठनों को विश्वास में लेकर किसानों की काउंसलिंग करवाएं और कोशिश हो कि पराली को नष्ट करने का काम सरकारी खर्चे पर हो।

दूसरी फसल के लिए कम समय और अधिक खर्च समस्या 
क्रांतिकारी किसान यूनियन के प्रधान डॉ. दर्शन पाल का कहना है कि पराली जलाना हमारा शौक नहीं है। धान की फसल पर पहले ही बहुत अधिक खर्च आता है। अगर सरकार के बताए तरीके से पराली से निपटने के लिए मशीनों का इंतजाम भी कर लिया जाए तो भी प्रति एकड़ पांच से छह हजार रुपये का खर्च आता है, वह कौन वहन करेगा? किसानों की मजबूरी यह है कि अगली फसल की तैयारी के लिए समय कम होता है, तो दूसरी तरफ पराली को इकट्ठा करने में खर्चा भी आता है। पराली को लेकर जागरूकता आ रही है लेकिन समय लगेगा। किसान को हमेशा फसल प्यारी होती है, पराली को साफ नहीं करेगा तो गेहूं की फसल में सूंडी पैदा होने का खतरा मंडराता रहता है। 

मशीनों से फसल कटने से गहराई समस्या
किसान बलवंत सिंह का कहना है कि जब से धान की फसल मशीनों से कट रही है तब से यह समस्या गहरा गई है। मशीन एक फुट ऊपर से धान का पौधा काट देती है जो शेष भाग बचता है वह किसान के लिए समस्या बन जाता है। इसे कटवाने के बजाय किसान जला देता है। इस समस्या से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने एक मशीन तैयार की है, इसका नाम पेड्डी स्ट्रा चोपर है इसका दाम है 1.5 लाख है। इसे ट्रैक्टर के साथ जोड़ दिया जाता है और यह पराली के छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर खेत में फैला देती है लेकिन यह महंगी मशीनरी 55 हार्स पॉवर का ट्रैक्टर खरीदेगा कौन? किसानी तो फायदेमंद धंधा भी नहीं रहा है।

बढ़ा चढ़ाकर दिखाई जा रही समस्या
जम्हूरी किसान सभा के प्रधान डॉ. सतनाम सिंह अजनाला का कहना है कि वह लंबे समय से खेती पर काम कर रहे हैं, उस पर रिसर्च कर चुके हैं। किसान भी पर्यावरण के प्रति जागरूक हैं और पराली के प्रबंधन का विकल्प अपनाने लगे हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से दिल्ली में प्रदूषण की समस्या पैदा होने की बात को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है। हालांकि पिछले सालों के मुकाबले 25 फीसदी की कमी आई है। मौजूदा आप सरकार की तरफ से भी पंजाब के किसानों को कोई रियायत जमीनी स्तर पर नहीं दी गई है। 

मशीनों का फायदा बड़े किसानों को
किसानों की मानें तो पराली जलाना उनकी मजबूरी है। तरनतारन के गांव पंडोरी गोला के जसपाल सिंह, जसवंत सिंह  ने बताया कि सरकार की तरफ से भी छोटे किसानों को पराली प्रबंधन के लिए मशीनें नहीं दी जा रही, इन मशीनों का लाभ बड़े जमींदार ले जाते हैं। किसान नेता जसबीर सिंह पंधरी ने भी कहा कि किसान पर्यावरण के प्रति जागरूक हैं और वे पराली के प्रबंधन का विकल्प अपनाने लगे हैं। कृषि विभाग के अधिकारी व कर्मचारी गांव-गांव गोष्ठी कर किसानों को पराली न जलाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पराली जलाने से होने वाले नुकसान के बारे में भी बता रहे हैं। कृषि विभाग के इन सभी प्रयासों के बाद भी किसान खेतों पर पराली जलाने से बाज नहीं आ रहे हैं।  
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