चंडीगढ़। वेलेंटाइन डे सिर्फ एक लड़का और लड़की के बीच प्यार तक खत्म नहीं होता। आपके जीवन में कुछ लक्ष्य होता है। उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए जिन लोगों की जरूरत होती है, वही आपके सही वेलेंटाइन हैं। हर बच्चे को शिक्षा मिले। रुपयों व अन्य सुविधाओं के अभाव में वह शिक्षा से वंचित न रहें, इसलिए मेरे वेलेंटाइन ये बच्चे हैं, इसलिए एनजीओ परवाज फाउंडेशन का रजिस्ट्रेशन 14 फरवरी को ही कराया।
यह कहना है सेक्टर 46 निवासी 21 वर्षीय शिप्रा का। शिप्रा वर्तमान में एमए प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। शिप्रा ने साल 2015 में 12वीं की पढ़ाई पूरी की और गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का लक्ष्य बनाया। इस पूरे काम में सेक्टर 24 निवासी 23 वर्षीय विक्रांत ने उनका पूरा साथ दिया। मात्र पांच बच्चे के साथ लक्ष्य की ओर शिप्रा ने कदम रखा। उसके बाद ‘दृष्टि’ प्रोजेक्ट के तहत वर्ष 2018-19 में दोनों ने धनास क्षेत्र में कक्षा एक से 12वीं तक के 200 बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इनमें कई बच्चे ऐसे थे, जिनके पास एनसीआरटीई की किताबें तो थीं, लेकिन उन्हें कुछ समझ नहीं आता था। इस कारण वह फेल हो जाते थे। वर्ष 2018-19 में अच्छे अंकों के साथ सभी बच्चे पास हुए। उसके बाद 14 फरवरी 2019 को परवाज फाउंडेशन को रजिस्टर्ड कराया।
बच्चों के सपनों को मिले उड़ान, इसलिए संस्था का नाम रखा ‘परवाज’
शिप्रा ने वर्ष 2019 में अपनी संस्था का नाम ‘परवाज’ रखा और 14 फरवरी को रजिस्टर्ड कराया। इसमें शिप्रा प्रेसीडेंट और विक्रांत डायरेक्टर हैं। शिप्रा का मानना है कि परवाज एक उर्दू शब्द है, जिसका अर्थ है उड़ान। शिक्षित बच्चों को एक खुला आसमान मिलता है। जहां बच्चे अपनी स्वतंत्रता व अधिकार के साथ उड़ सकते हैं। बस इसलिए संस्था का नाम परवाज रखा गया है। शिप्रा का कहना है कि वह इन बच्चों से प्यार करती हैं, इसलिए वेलेंटाइन डे का दिन ही संस्था के रजिस्ट्रेशन के लिए चुना।
इलाहाबाद में मिली सीख, आंसुओं को बनाया ताकत
शिप्रा के पिता इलाहबाद में पदस्थ थे। कुंभ में त्रिवेणी संगम पर जब शिप्रा अपने परिजनों के साथ गईं तो वहां बच्चों की हालत देख रोने लगी। पिता के दोस्त ने समझाया कि इन आंसुओं को अपनी ताकत बनाओ। बस उसी क्षण शिप्रा ने इन बच्चों की शिक्षा का प्रण लिया और 12वीं के बाद उनकी शिक्षा के काम में जुट गईं।
तीन हजार किताबों का पुस्तकालय
शिप्रा और विक्रांत सेक्टर 25 स्थित यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलोजी में बच्चों को शिक्षा देते हैं। दोनों ने अपनी पॉकेट मनी और लोगों के सहयोग से अब तक तीन हजार किताबों का एक पुस्तकालय तैयार किया है। इसमें अब तक लगभग 50 हजार रुपये दोनों खर्च कर चुके हैं ताकि किताबों के अभाव में किसी की शिक्षा न रुके।