मनीमाजरा निवासी 80 वर्षीय शीलावंती के पास किराए के घर में रहने के लिए पैसे नहीं थे। एक ही बेटा है, जो पूछता तक नहीं। मार्च 2019 में हेल्पलाइन के जरिए सेक्टर-15 के वृद्धाश्रम पहुंचीं, तब से यहीं रह रही हैं। शीलावंती कहती हैं कि लोगों को श्राद्ध का मतलब ही नहीं पता। जीते जी जो पानी नहीं पूछते, मरने के बाद दूध चढ़ाते हैं, ऐसे में वो कैसे सोच सकते हैं कि पितृ खुश हो जाएंगे। यदि जिंदा माता-पिता को खुश कर लिया तो तुम्हारे पितृ तुमसे कभी नाराज हो ही नहीं सकते।
सड़क हादसे में चारों बच्चे चल बसे, वृद्धाश्रम ही है अब इनका घर
105 वर्षीय सुरेंद्र कुमार भल्ला रेलवे में नौकरी करते थे। अब इसी वृद्धाश्रम में बीते 16-17 वर्षों से रह रहे हैं। कहते हैं अब यही मेरा घर है। सुरेंद्र कुमार के चारों बच्चे ऑटो में स्कूल जाते समय एक सड़क हादसे में चल बसे थे। इस सदमे में उनकी सुनने की शक्ति खत्म हो गई। एक शादीशुदा बेटी है, जो सप्ताह में एक बार वीडियो कॉल करती है। बेटी को देखकर उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। वृद्धाश्रम में कार्यरत वंदना भाटिया उन्हें हर बात समझाती हैं।
माता-पिता की सेवा करती है तो जीते जी करो
75 वर्षीय विद्या देवी का कहना है कि उनकी कोई औलाद नहीं है। पति की मौत के बाद वर्ष 2016 में वह इस वृद्धाश्रम में आ गईं। वह इस बात को लेकर जिंदगी भर तड़पती रहीं कि उनकी औलाद नहीं है लेकिन यहां कई ऐसे बुजुर्ग भी हैं, जिनके बच्चे तो हैं लेकिन वह उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ गए। विद्या देवी कहती हैं कि मां-बाप को बेसहारा छोड़ देना और मरने के बाद श्राद्ध करके इतिश्री कर देना तो मेरी समझ से परे है। सेवा करनी है तो जीते जी करो, मरने के बाद किसने देखा है।