कारगिल युद्ध में शहीद हुए और परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा पर बायोपिक फिल्म बनेगी। इसकी शूटिंग पीयू में की जाएगी। इसके लिए फिल्म डायरेक्टर करण जौहर के प्रोडक्शन हाउस की टीम ने पीयू का दौरा किया। यह टीम पीयू के अंग्रेजी विभाग, स्टूडेंट्स सेंटर सहित अन्य जगह पर गई। इसके अलावा इस फिल्म की शूटिंग डीएवी कालेज सेक्टर -10 चंडीगढ़ सहित हिमाचल के पालमपुर में भी की जाएगी।
फिल्म में कैप्टन बत्रा का रोल अभिनेत्रा सिद्घार्थ मल्होत्रा निभा सकते हैं। फिल्म के माध्यम से उनकी वीरता को बताया जाएगा। इसके लिए शूटिंग की परमिशन भी धरमा प्रोडक्शन की ओर से मांगी जाएगी। वहीं यह शूटिंग चंडीगढ़ के अलावा डिफेंस एकेडमी में होगी। कैप्टन विक्रम बत्रा ने जहां ट्रेनिंग की थी, वहां पर भी शूटिंग की परमिशन मांगी जाएगी। इसके लिए प्रोडक्शन हाउस की ओर से दौरा किया गया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस फिल्म की शूटिंग के लिए चंडीगढ़ के अन्य स्पॉट भी प्रोडक्शन हाउस की ओर से देखे गए हैं। बता दें कि हाल ही में पीयू में शूटिंग रेंज का नाम बत्रा के नाम पर रखा गया है।
ये शहादत बत्रा जैसे शूरवीरों के हिस्से ही आती है
विज्ञान विषय में स्नातक करने के बाद विक्रम का चयन सीडीएस के जरिए सेना में हुआ था। जुलाई 1996 में उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में प्रवेश लिया। दिसंबर 1997 में प्रशिक्षण समाप्त होने पर उन्हें 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली थी।
उन्होंने 1999 में कमांडों ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए। एक जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया था। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद विक्रम को कैप्टन बना दिया गया। इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को दी गई।
बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया। विक्रम बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष ‘यह दिल मांगे मोर’ कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया। इसी दौरान विक्रम के कोड नाम शेरशाह के साथ ही उन्हें कारगिल के शेर की संज्ञा दे दी गई।
सेना ने चोटी 4875 को भी कब्जे में लेने का अभियान शुरू कर दिया। इसके लिए भी कैप्टन विक्रम और उनकी टुकड़ी को जिम्मेदारी दी गई थी। उन्होंने जान की परवाह न करते हुए अपने साथियों के साथ, जिनमें लेफ्टिनेंट अनुज नैयर भी शामिल थे, कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा। 7 जुलाई 1999 को लड़ाई के दौरान एक विस्फोट में उनके कनिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट नवीन के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए थे। जब कैप्टन बत्रा लेफ्टिनेंट नवीन को बचाने के लिए पीछे घसीट रहे थे, उनकी छाती में गोली लगी और वे जय माता दी कहते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। मरणोपरांत उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया था।