स्वर्ण कौर कहती हैं कि मेरी बहू ने मुझे फूटी कौड़ी नहीं दी। दलबीर की मौत के बाद उसके माता-पिता घर आए। कहने लगे कि इसकी उम्र छोटी है। जिंदगी अकेले नहीं जी जा सकती और नवप्रीत को अपने साथ ले गए। वे कहती हैं कि बहू बेशक अपना घर बसाए लेकिन मुझे मेरे बेटे की निशानी दे जाए। जब बहू की शादी हो जाएगी तो क्या मुझे अपने पोती लेने का अधिकार नहीं है।
इस दौरान स्वर्ण कौर की आंखें छलकने लगी। स्वर्ण कौर ने बताया कि मेरे बेटे मजदूरी करते थे। बड़ा बेटा बलबीर भी काम पर जाता था लेकिन जब से दलबीर की मौत हुई है, उसका मजदूरी करने में दिल नहीं लग रहा। भाई को याद करते ही रोना शुरू कर देता है।
वे कहती हैं कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, पंजाब सरकार मेरे बड़े बेटे को नौकरी दे दे। कुछ पल खामोश रहने के बाद स्वर्ण कौर ने कहा कि पता नहीं मोदी सरकार ने दो लाख की राशि अभी तक क्यों नहीं भेजी। जब उन्हें कहा गया कि यह राशि भी बहू को मिलेगी, तो रोते-रोते बोली फिर मैं रोटी कहां से खाऊंगी।
धार्मिक विचारों का था दलबीर
बीबी स्वर्ण कौर ने बताया कि मेरा बेटा धार्मिक विचारों का था। 20 साल से रामलीला में कई रोल करता था। हर साल अपने कंधों पर राम-लक्ष्मण पात्रों को उठाकर रावण के पास लेकर जाता था।
उस मनहूस दिन जब वह स्टेज पर पहुंचा तो उसने देखा कि रेल ट्रैक पर काफी लोग खड़े हैं। अपने तीन साथियों को साथ लेकर ट्रैक के पास गया। उधर से गाड़ी आ रही थी। दलबीर और उसके साथियों ने कई लोगों को धक्के मारकर ट्रैक से हटाया लेकिन उसका पांव भी ट्रैक में फंस गया और उसकी मौत हो गई।