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13 साल में PhD नहीं कर पाई: गोल्डन चांस भी मिला, ईरानी छात्रा पहुंची हाईकोर्ट; रिफ्यूजी रहने की भी थी मांग

Fri, 11 Apr 2025 07:30 AM IST
अंकेश ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

ईरानी की नागरिक मेहरी मालेकी डिजीचेह चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर रही है। छात्रा 13 साल में पीएचडी पूरी नहीं कर पाई है। उसे गोल्डन चांस भी दिया गया। ऐसे में अब छात्रा ने हाईकोर्ट का रूख किया था। 
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पंजाब यूनिवर्सिटी - फोटो : फाइल
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विस्तार
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 13 साल में भी पीएचडी पूरी न कर पाने पर ईरानी नागरिक व पंजाब यूनिवर्सिटी में शोध छात्रा मेहरी मालेकी डिजीचेह को आगे मौका देने से इन्कार कर दिया। इसके साथ हाईकोर्ट ने उसकी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

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छात्रा ने दो अलग-अलग याचिकाओं के माध्यम से हाईकोर्ट से आग्रह किया था कि उसे अपनी थीसिस जमा करने के लिए एक और अंतिम अवसर दिया जाए, वीजा अवधि को एक वर्ष तक बढ़ाया जाए, ओवरस्टे पर लगे जुर्माने को माफ किया जाए और विश्वविद्यालय से उसे हॉस्टल की सुविधा दोबारा उपलब्ध कराई जाए। साथ ही भारत में रिफ्यूजी के तौर पर निवास की अनुमति दी जाए।

इस छात्रा का प्रवेश 2012 में पंजाब यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग में पीएचडी कोर्स के लिए हुआ था। नियमों के अनुसार उसे आठ वर्षों के भीतर अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी, लेकिन कोविड-19 महामारी समेत कई कारणों के चलते वह समय सीमा में थीसिस जमा नहीं कर पाई। विश्वविद्यालय ने सहानुभूतिपूर्वक उसे 2022 में गोल्डन चांस देते हुए 30 दिसंबर, 2022 तक थीसिस जमा करने का अवसर दिया, लेकिन छात्रा फिर भी असफल रही।

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तय समय सीमा में थीसिस जमा करने में असफल रही छात्रा

हाईकोर्ट ने 24 फरवरी, 2025 को सुनवाई के दौरान छात्रा को एक बार फिर विशेष मौका देते हुए विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह स्थिति की गंभीरता को देखते हुए छात्रा को अंतिम अवसर प्रदान करे। विश्वविद्यालय की 6 मार्च, 2025 को हुई बैठक में छात्रा को 15 दिन में थीसिस जमा करने की अनुमति दे दी गई। साथ ही उसे डिजिटल लाइब्रेरी और अपने दस्तावेजों तक पहुंच भी प्रदान की गई, लेकिन 8 अप्रैल, 2025 को हुई अंतिम सुनवाई में यह सामने आया कि छात्रा निर्धारित समय सीमा में थीसिस जमा करने में असफल रही और केवल एक दिन पहले अपने गाइड को थीसिस का प्रारूप सौंपा, जबकि जमा करने की प्रक्रिया संबंधित प्राधिकारी के पास होती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2012 से अब तक 12-13 वर्षों में दिए गए कई अवसरों के बावजूद छात्रा अपनी शैक्षणिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल रही है। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि अब और कोई अवसर नहीं दिया जा सकता।

कहा- संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त की ओर से घोषित की गई शरणार्थी

याचिकाकर्ता ने यह तर्क भी दिया कि वह अपने देश में खतरे के कारण संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त की ओर से शरणार्थी घोषित की गई है। उसने भारत सरकार से स्थायी निवास के लिए आवेदन भी किया है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं करते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं, लेकिन छात्रा को स्वतंत्र रूप से भारत सरकार के समक्ष अपनी शरणार्थी स्थिति के लिए आवेदन करने की छूट दी है।
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छह साल में पीएचडी पूरी करने का नियम

पीएचडी को लेकर 2022 में आई यूजीसी की गाइडलाइन के अनुसार 6 साल में डिग्री लेना होगा। यह छह साल नामांकन के डेट के साथ गिने जाएंगे। अगर किसी छात्र के साथ समस्या है तो उसको ज्यादा से ज्यादा दो साल का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। महिलाओं को दो साल की एक्स्ट्रा छूट दी जा सकती है। हालांकि उसके लिए रि-रजिस्ट्रेशन कराना होगा। उसमें भी वाजिब कारण अगर नहीं होता है तो उसको रद्द किया जा सकता है। उस समय के यूजीसी चेयरमैन एम जगदीश कुमार का कहना था कि 6 साल की समय सीमा करने से पढ़ाई में अच्छे छात्र कम उम्र में पीएचडी करेंगे। क्योंकि पीएचडी करने में कई छात्र काफी ज्यादा समय ले लेते थे। उसकी वजह से सीट खाली नहीं हो पाती थी और नए छात्रों को शोध करने का कम मौका मिलता था।
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