पीजीआई की नर्सिंग ऑफिसर परमिंदर कौर के हौसले की जितनी तारीफ की जाए कम है। उन्होंने पीजीआई प्रशासन से आग्रह कर अपनी ड्यूटी कोरोना डेडीकेटेड हॉस्पिटल में लगवाई। वहां ड्यूटी के दौरान मानकों का पालन करते हुए कोरोना के गंभीर मरीजों के इलाज में सहयोग कर रही हैं। परमिंदर का कहना है कि मौजूदा समय में जब देश कोरोना जैसी महामारी की चपेट में है, तब उनका फर्ज बनता है कि नर्सिंग ऑफिसर होने के नाते वह भी कोरोना के मरीजों के इलाज में कंधे से कंधा मिलाकर चले।
पापा ने कहा- योद्धा की तरह डटकर करो मुकाबला
परमिंदर ने बताया कि उनके पिता आर्मी से रिटायर हैं। चंडीगढ़ में कोरोना के मामले आने शुरू हुए तब उन्होंने एहतियात बरतने की सलाह दी। धीरे-धीरे 4 महीने गुजर गए, लेकिन स्थिति सामान्य नहीं हो पाई। तब पापा ने कहा कि पैरामेडिकल स्टाफ होने के नाते मेरा भी कोविड- हॉस्पिटल में ड्यूटी के लिए जाना जरूरी है। उनकी बातें सुनकर मुझे भी यह एहसास हुआ कि कोरोना योद्धाओं की तरह मुझे भी पॉजिटिव मरीजों के बीच रहकर नर्सिंग के संकल्प को चरितार्थ करना चाहिए।
मैंने पीजीआई प्रशासन शासन से अनुरोध करके अपनी ड्यूटी कोविड-हॉस्पिटल में लगवाई। पीपीई किट पहन कर काम करना बहुत ही कठिन साबित हुआ । किट के अंदर दम घुट रहा था। ऐसा लग रहा था कि अगले ही पल मैं बेहोश हो जाऊंगी। लेकिन मैंने खुद को संभाला और हिम्मत देकर अपनी ड्यूटी पूरी की। अगले दिन स्थिति धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। मुझे अपने सहयोगियों को देखकर हिम्मत आती थी। ड्यूटी के दौरान हमने मिलकर कई गंभीर मरीजों की देखभाल की और उन्हें ठीक होता देखा।
जीवन में सबसे खास अनुभव दिया कोरोना ने
परमिंदर ने बताया कि कोविड अस्पताल में ड्यूटी कर जीवन में अब तक का सबसे खास अनुभव प्राप्त हुआ है। कोरोना महामारी से जूझ रहे वहां भर्ती मरीजों को देखकर जिंदगी और मौत को करीब से देखने का मौका मिला। इलाज के बल पर कुछ मरीजों को ठीक होता देखकर जहां एक ओर खुशी मिलती थी वहीं जिंदगी गंवाने वाले मरीजों को देख कर मन दुखी हो जाता था। परमिंदर का कहना है कि कोरोना ने जीवन जीने का तरीका बदलने के साथ ही जिंदगी की सोच बदल कर रख दी है।