बहरहाल राज्य में जैसे हालात बन रहे हैं, उसमें एक बात तो तय है कि आगामी विधानसभा चुनाव में वोटों का खूब ध्रुवीकरण होगा। कहीं दलित समाज इसका केंद्र बिंदु होगा तो कहीं जाट सिख बनाम गैर जाट वोटों का बंटवारा होगा। कांग्रेस का मुख्य वोट दलित सिख और हिंदू वर्ग से आता है। वहीं, अकाली दल एक तरह से मुख्यधारा के सिखों और धनी जाटों (जट सिख) में अपनी पैठ से ही सत्ता में आता है। आप अभी तक राज्य में अपना कोई विशेष वोट बैंक स्थापित नहीं कर पाई है।
शिअद-बसपा गठबंधन से ग्रामीण दलित वोट शेयर में आएगा बदलाव
इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि इस बार पंजाब की स्थिति काफी बदल चुकी है। बसपा का शिअद से गठबंधन जहां ग्रामीण दलित वोटों को एकजुट कर वोट शेयर में बदलाव लाएगा। वहीं 25 वर्षो तक लगातार हिंदू-सिख एकता के प्रतीक रहे अकाली-भाजपा गठबंधन में दरार अब नि:संदेह राज्य में हिंदू वोट बैंक को भी नए सिरे से अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं तय करने पर बाध्य करेगी। ऐसे में कांग्रेस के दिग्गजों की नजर हिंदू वोट बैंक पर है, जिनके बलबूते पर पंजाब में सरकार बनती है।
शहरी हिंदुओं में कैप्टन की पैठ
कैप्टन अमरिंदर सिंह का हिंदूओं में खासा जनाधार था। कारण वह राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बेबाक बोलते थे और आतंकवाद के खिलाफ उनकी ललकार सुनने को मिलती थी। ऐसे में शहरी वर्ग कांग्रेस के लिए हमेशा खड़ा होता आया है। शहर के लोगों ने आतंकवाद का काला दौर देखा है। आतंकवाद को पंजाब से खत्म करने का श्रेय कांग्रेस को जाता है। वहीं कांग्रेस हाईकमान हिंदू नेताओं को आगे लाने पर विचार कर रहा है। सुनील जाखड़, ब्रह्म मोहिंदरा और विजय इंदर सिंगला के नाम मुख्यमंत्री पद की रेस में हैं।