कांग्रेस आलाकमान कैप्टन के तल्ख तेवरों से परेशान था। पंजाब कांग्रेस में कैप्टन के बढ़ते रसूख और उनके निर्णय आलाकमान को परेशान कर रहे थे। कैप्टन ने अपने नेतृत्व में चुनाव लड़ा और जीतकर आए, उसके बाद से उनके तेवर और तल्ख थे। मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर पंजाब सरकार के सभी फैसलों में कैप्टन की ही चली। लिहाजा आलाकमान को उनके विकल्प की तलाश तो 2017 से थी लेकिन चेहरा नहीं मिल रहा था।
नवजोत सिंह सिद्धू के कांग्रेस में शामिल होने के बाद आलाकमान की यह तलाश पूरी हुई, जिसके बाद से लगातार कैप्टन के तेवर से परेशान आलाकमान कैप्टन पर इस्तीफे को लेकर दबाव बना रहा था। कैप्टन के सामने ऐसे हालात 2003 में भी पैदा हुए थे लेकिन उस समय कैप्टन इस संकट से उबरने में सफल रहे ।
2002 से लेकर 2007 तक पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी। इस दौरान कांग्रेस की वरिष्ठ नेता राजिंदर कौर भट्ठल ने कैप्टन का विरोध शुरू कर दिया था। वह कैप्टन को हटाने के लिए 40 विधायकों को लेकर दिल्ली कूच कर गईं थीं, हालांकि उनका यह दबाव काम नहीं आया और आलाकमान ने कैप्टन को क्लीन चिट दे दी थी। इस दौरान सोनिया गांधी ने दोनों के बीच मध्यस्थता कराकर भट्ठल को उपमुख्यमंत्री पद देकर अन्य विरोधी विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करा दिया था। जिसके बाद कई ऐसे मौके आलाकमान के सामने आए, जिसमें कैप्टन के विरोधी तेवरों से रूबरू होना पड़ा।
2017 में विधानसभा चुनाव से पहले भी कैप्टन के तेवरों पर आलाकमान ने ऐतराज जताया लेकिन कैप्टन के स्तर का कोई नेता पार्टी में न होने के कारण मजबूरी में कैप्टन को ही विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी देनी पड़ी। चार साल पहले भाजपा से इस्तीफा देकर जब नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस ज्वाइन की तो आलाकमान ने उसी समय यह तय कर लिया था कि अब 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब में कांग्रेस का चेहरा बदला जाएगा।
इन मुद्दों से नहीं उबर पाए कैप्टन
इस बार कुछ ऐसे मुद्दे रहे, जिनसे कैप्टन अपने विपक्षियों से जीत नहीं पाए। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा उनकी पार्टी के विधायकों, मंत्रियों और नेताओं से दूरी रहा। सिद्धू सहित अन्य विपक्षियों ने इसे कैप्टन के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाया। इसके साथ ही अफसरशाही को ज्यादा तवज्जो देना, शिअद के साथ नजदीकियों को भी विपक्षियों ने हथियार के रूप में कैप्टन के खिलाफ इस्तेमाल किया।