बदलाव का दौर जारी है, ऐसे में पंजाब भाजपा में बड़े फेरबदल से संबंधित फरमान किसी भी वक्त आ सकता है। इसमें मंत्री तथा प्रदेश पदाधिकारी दोनों शामिल हो सकते हैं। विचार-विमर्श की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।
इसका साफ असर पार्टी के प्रदेश नेताओं के व्यवहार पर भी दिखाई पड़ रहा है। उनकी विशेष रुचि सरकार या संगठन के काम में दिखाई नहीं पड़ रही।
प्रदेश भाजपा मुख्यालय पर हर बुधवार आयोजित होने सहयोग कार्यक्रम में भी पार्टी मंत्रियों की हाजिरी लोकसभा चुनाव के वक्त से कम ही दिखाई पड़ रही है।
इस कार्यक्रम के तहत पंजाब के चारों भाजपाई मंत्री पार्टी कार्यकर्ताओं की शिकायतें सुनकर उनका निवारण करते थे।
पार्टी के राष्ट्रीय नेता कर चुके हैं विचार-विमर्श
जानकारों के अनुसार इस उठापटक के बीच पंजाब केबिनेट में शामिल भाजपा के चार मंत्रियों में से तीन ने कुछ दिन तक दिल्ली में डेरा डाले रखा। इस दौरान उन्होंने अपने पक्ष में लॉबिंग की, ताकि किसी तरह कुर्सी बच जाए।
लेकिन इतना तय है कि बदलाव का फैसला भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने ले लिया है। इसकी औपचारिक घोषणा किसी भी वक्त हो सकती है। किसकी कुर्सी जाएगी और किसकी बचेगी, इसी पर निगाहें टिकी हुई हैं।
लोकसभा चुनाव का निराशाजनक प्रदर्शन मुख्य वजह
लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद प्रदेश में अकाली-भाजपा प्रत्याशी केवल 6 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाए थे। यहां तक कि अरुण जेटली भी अमृतसर से चुनाव हार गए।
इसका पार्टी ने गंभीर नोटिस लिया और प्रदेश प्रभारी शांता कुमार ने यहां तक कह दिया कि सरकार व संगठन की कमियों की वजह से यह हालत हुई, जिनमें सुधार की जरूरत है।
गत 25 जून को उनके पंजाब दौरे के दौरान मंत्रियों चूनी लाल भगत, मदन मोहन मित्तल, सुरजीत कुमार ज्याणी तथा अनिल जोशी के इस्तीफों व उनकी जगह नए मंत्री बनाए जाने की चर्चा थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।