रिचा ने बताया कि पौधे के एक्टिव कपाउंड को तकनीकी मानक के आधार पर प्राप्त किया गया। उसके बाद लैब में मलेरिया कल्चर को विकसित किया गया। उस कल्चर को पृश्निपर्णी से निकाले गए कंपाउंड को तय मानक में दिया गया जिससे मलेरिया के परजीवी तेजी से समाप्त हुए। इस परिणाम का चूहों पर आकलन किया गया। चूहों को इस कंपाउंड से तैयार की गई दवा लिक्विड रूप में दी गई।
पीजीआई की कमेटी ने इसे स्वीकृति दे दी
चूहे पर इस दवा का कोई दुष्प्रभाव सामने नहीं आया। मानव पर इसके दुष्प्रभाव को आकलन करने के लिए लैब में आरबीसी और किडनी सेल लाइन पर इसका असर देखा गया। वहां भी परिणाम सकारात्मक रहा। पीजीआई की कमेटी ने इसे स्वीकृति दे दी है। इस शोध को एशियन पेसेफिक कांग्रेस ऑफ क्लीनिकल माइक्रोबायोलॉजी एंड इन्फेक्शन के जुलाई में कोरिया में होने वाले 19वें कॉन्फ्रेंस में सम्मानित होने के लिए चयनित किया गया है।
पिठवन का स्वाद कड़वा, कसैला और तासीर गर्म होती है। यह जलन, बुखार, अतिसार, रक्त-अतिसार, पेचिश, खूनी बवासीर, ज्यादा प्यास, उल्टी, सांप-बिच्छू के काटने पर प्रयोग होता है। इसके सेवन से खांसी और कफ नष्ट होता है।
आयुर्वेद की प्रमुख जड़ी बूटियों में से एक
पिठवन को डबरा, पीठावन, धवानी, चित्रपर्णी, अग्निपर्णी, और सित्तिरप्पलादी भी कहा जाता है, आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण जड़ी बूटी है। यह दशमूल में से एक है- दस औषधीय जड़ी बूटियों की जड़ों का संयोजन होता है। यह नेपाल, भारत, चीन और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है। भारत में यह व्यापक रूप से बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में पाया जाता है। पृश्निपर्णी के अद्भुत स्वास्थ्य लाभों ने इसे आयुर्वेद की प्रमुख जड़ी बूटियों में से एक बना दिया है।