परिवार के सदस्य बताते हैं कि लंगर बाबा 1947 में पेशावर से विस्थापित होकर मानसा (पंजाब) आ गए थे। उस समय उनकी उम्र करीब 12 वर्ष थी। इतनी कम उम्र से ही उनका जीवन संघर्ष शुरू हो गया था।परिवार विस्थापन के दौरान गुजर गया था। ऐसे में जिंदा रहने के लिए उन्हें रेलवे स्टेशन पर नमकीन दाल बेचनी पड़ी। कई बार तो बिक्री न होने पर उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता था।
मानसा से वह पटियाला आ गए और गुड़ और फल बेचकर जीवनयापन शुरू किया। यहां से 1956 में लगभग 21 साल की उम्र में चंडीगढ़ आए। उस समय चंडीगढ़ को देश का पहला योजनाबद्ध शहर बनाया जा रहा था। यहां उन्होंने एक फल की रेहड़ी किराए पर लेकर केले बेचना शुरू किया। काम चल निकला और ठीकठाक कमाई होने लगी। इसके बाद वर्ष 1981 में चंडीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में उन्होंने लंगर लगाना शुरू किया।