उनका कहना था कि अब इसे घर ले जाओ और वहीं पर सेवा करो लेकिन परिजनों ने मरीज को घर ले जाने की बजाय इलाज के इंतजार में अस्पताल की इमरजेंसी में पूरी रात गुजार दी। इस दौरान कोई भी डॉक्टर मरीज को देखने नहीं आया। अगली सुबह भी मरीज के बेटे ने डॉक्टर से इलाज करने को कहा तो डॉक्टरों ने उसे कहीं और ले जाने की बात कह कर इलाज करने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं मरीज को रेफर करने की बजाय उसके बेटे से ‘लामा’ लिखवाकर उसे अस्पताल से भगा दिया।
पंजीकरण के पर्चे पर लिखा लामा।
रेफर करने से किया इनकार
शुक्रवार को जब अमन अपने पिता को लेकर जीएमसीएच-32 की इमरजेंसी में पहुंचा तो डॉक्टरों ने दो इंजेक्शन लगाने के बाद कह दिया कि किसी निजी अस्पताल में इलाज कराने जाओ, जीएमसीएच-32 में इस बीमारी का इलाज उपलब्ध नहीं है। अमन ने बताया कि उन्होंने डॉक्टर से पीजीआई रेफर करने के लिए कहा तो डॉक्टरों ने कोरोना के कारण अस्पताल में रेफर की प्रक्रिया बंद होने की बात कही। उनका कहना था कि वह रेफर नहीं कर सकते हैं।
मदद करने की बजाय लिखवा लिया लामा
अमन ने बताया कि शुक्रवार की शाम से लेकर शनिवार की सुबह तक अपने पिता के इलाज के लिए वह डॉक्टरों के आगे मिन्नतें करते रहे। शनिवार की सुबह उन्होंने अस्पताल के डायरेक्टर प्रिंसिपल से मिलने की कोशिश भी की। वह तो नहीं मिले लेकिन वहां मौजूद एक अन्य अधिकारी ने उनसे पंजीकरण के पर्चे पर लामा लिखकर उनका हस्ताक्षर करवा लिया और कहा कि यहां से चले जाओ अस्पताल में तुम्हारे पिता का इलाज नहीं हो सकता।
पीजीआई में मिला फौरन इलाज
जीएमसीएच-32 से भगाए जाने के बाद अमन अपने पिता को लेकर आनन-फानन में पीजीआई पहुंचे। पीजीआई की इमरजेंसी में डॉक्टरों ने तत्काल उनके पिता का सीटी स्कैन कराया और रिपोर्ट देखते ही इलाज शुरू किया। उन्हें इंजेक्शन और कुछ दवाइयां देने के साथ ही ड्रिप भी चढ़ाई। अमन ने बताया कि यह सारी प्रक्रिया होने में एक से डेढ़ घंटे का समय लगा। उसके बाद एक सीनियर डॉक्टर ने आकर उनके पिता का चेकअप किया और उन्हें घर ले जाकर उनकी देखभाल करने को कहा। उन्होंने बताया कि 3 दिन बाद फिर से उन्हें लेकर अस्पताल आना होगा। दोबारा सीटी स्कैन करके उनकी वास्तविक स्थिति देखकर बताया जा सकेगा कि आगे क्या करना है।