आप की कैंडीडेट गुल पनाग को भले ही हार का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वे पार्टी के लिए एक जनाधार तैयार कर गईं हैं। आम आदमी पार्टी पहली बार चंडीगढ़ में अपनी किस्मत आजमा रही थी और पार्टी ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। पार्टी को चुनाव में कुल 1,08679 वोट मिले।
करीब 24 प्रतिशत पार्टी का वोटिंग शेयर रहा, जो कांग्रेस उम्मीदवार पवन बंसल से मात्र ढाई प्रतिशत से कम है। यह भी पहली बार हुआ कि शहर में किसी तीसरे विकल्प को एक लाख से ज्यादा वोट मिले हों। इससे पहले जब हरमोहन धवन निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर खड़े थे तो उन्हें 60 हजार से ज्यादा वोट मिले थे।
यह चंडीगढ़ की जनता के लिए अच्छी बात है कि उनके सामने एक और विकल्प भी तैयार हो गया है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि गुल को अब इस जनाधार को मेन्टेंन करना होगा। यदि उन्होंने ध्यान नहीं दिया तो यहां भी दिल्ली जैसा हाल हो सकता है।
सेंटर में जो सरकार बनने जा रही, उसी को युवाओं का वोट
पीयू के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर आशुतोष बताते हैं कि चंडीगढ़ का वोटर तबका पढ़ा लिखा है। उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि यहां की बागडोर केंद्र के हाथ में रहती है।
इसलिए जब भी केंद्र के चुनाव होते हैं तो वे इस बात का जरूर ध्यान रखते हैं कि सेंट्रल में सरकार किसकी बनने जा रही है और वे उसी पार्टी के कैंडीडेट को वोट देते हैं।
इस सोच के बावजूद एक लाख वोट हासिल करना बड़ी बात है। यहां यह भी समझना होगा कि चंडीगढ़ में व्यापारी और बाबू वर्ग की जनसंख्या काफी अधिक है। ये वर्ग भी केंद्र को ध्यान में रखकर अपनी वोटिंग करते आए हैं।
तो फिर पंजाब की तरह झाड़ू चलती
पार्टी ने कुछ बातों पर ध्यान दिया होता तो यहां भी पंजाब की तरह झाड़ू चलती। पार्टी ने गुल पनाग को चुनने में थोड़ी देरी दिखाई।
यह फैसला पार्टी के लिए काफी नुकसानदायक साबित हुआ है। यदि सविता भट्टी को टिकट देने के बजाए उस दौरान गुल पनाग को चुनते तो इसका असर कुछ और ही रहता।
कुछ लोग मान रहे थे कि गुल मुंबई में रहती है, यदि वे जीती तो चंडीगढ़ में वक्त नहीं दे पाएंगी। गुल लोगों के इस मूड को बदल नहीं पाईं। उन्होंने लोगों से अच्छा कनेक्ट किया, लेकिन उसे वे वोट में नहीं बदल पाई।
अब संगठन की ओर ध्यान देना होगा
पार्टी का अब तक संगठन बहुत ही कमजोर रहा है। पार्टी को अब उसकी मजबूती की ओर से ध्यान देना होगा। पार्टी का फिलहाल चंडीगढ़ में सिर्फ वालंटियर हैं और उनके ऊपर ऑब्जर्वर। इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा है।
राजनीति विशलेषक आशुतोष का मानना है कि पार्टी की जीत संगठन पर काफी निर्भर करती है। सभी राजनीतिक पार्टियों का संगठन काफी मजबूत है और आप का उतना कमजोर। दिल्ली चुनाव के बाद पार्टी को संगठन पर ध्यान देना चाहिए था, लेकिन वे कर नहीं पाए।