विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एसके सहरावत ने बताया कि खरीफ में काश्त की जाने वाली मूंग की इस किस्म की खासियत यह है कि इसकी फसल एक साथ पककर तैयार होती है। इस किस्म की फलियां काले रंग की होती हैं और बीज मध्यम आकार के हरे व चमकीले होते हैं। इसका पौधा कम फैलावदार, सीधा एवं सीमित बढ़वार वाला है, जिससे इसकी कटाई आसान हो जाती है। यह किस्म विभिन्न राज्यों में 63 से 70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और इसकी औसत पैदावार भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार 12 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक आंकी गई है।
इन रोगों के प्रति होगी रोगरोधक क्षमता
इस किस्म की खास बात यह है कि इसमें पीला मौजेक, पत्ता झूरी, पत्ता मरोड़ जैसे विषाणु रोग तथा सफेद चुर्णी जैसे फफूंद रोगों की प्रतिरोधी है। इसके अतिरिक्त मूंग की इस किस्म में सफेद मक्खी व थ्रिप्स जैसे रस चूसक कीट एवं अन्य फली छेदक कीटों का प्रभाव भी पहले वाली किस्मों की तुलना में बहुत कम होगा। पादप एवं पौध प्रजनन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एके छाबड़ा ने बताया कि खरीफ के मौसम के लिए सिफारिश की गई इस किस्म का बीज अगले वर्ष किसानों के लिए उपलब्ध करवा दिया जाएगा।
इन वैज्ञानिकों की मेहनत लाई रंग
मूंग की एमएच-1142 किस्म विश्वविद्यालय के आनुवंशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के दलहन अनुभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजेश यादव, डॉ. रविका, डॉ. नरेश कुमार, डॉ. पीके वर्मा और एके छाबड़ा की लगभग 13 साल की मेहनत का परिणाम है। इस उपलब्धि को प्राप्त करने में डॉ. एसके शर्मा, डॉ. एएस राठी, डॉ. तरूण वर्मा व डॉ. रोशन लाल का भी विशेष योगदान रहा।
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