इसी तरह पटियाला सीट पर पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी पत्नी परनीत कौर को भाजपा से चुनाव मैदान में उतारा है। इससे पहली परनीत कांग्रेस से चुनाव लड़ती रही हैं। लेकिन हाल ही में वह भाजपा से शामिल हो गई थी और भाजपा ने उनको पटियाला से लोकसभा की टिकट भी थमा दी थी। कैप्टन के लिए ये चुनाव साख का सवाल बना हुआ है, क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में वह कैप्टन अमरिंदर सिंह पटियाला सीट पर हार गए थे।
यही काराण है कि ये लोकसभा चुनाव उनके लिए अहम है, क्योंकि इसके जरिए उनके पास अपनी राजनीतिक ट्रेन को दोबारा पटरी पर लाने का मौका है। बता दें कि परनीत कौर एरिया में चुनाव प्रचार में तो जुटी हुई हैं। पर उनके रास्ते में भी चुनौतियां कम नहीं है। किसानों के विरोध ने उनकी परेशानी बढ़ा दी है। वह जहां भी प्रचार के लिए जा रही हैं, उनको कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में उनके विरोध के दौरान एक किसान की मौत भी हो गई थी।
परनीत का सामना इस सीट पर आप के कैबिनेट मंत्री डाॅ. बलवीर सिंह, शिअद के एनके शर्मा और कांग्रेस प्रत्याशी पूर्व सांसद धर्मवीर गांधी से होगा। वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव में गांधी ने परनीत को मात दी थी। तब गांधी आम आदमी पार्टी में होते थे, लेकिन इस बार वह कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे हैं और परनीत खुद कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुई हैं।
इसी तरह केंद्रीय मंत्री सोमप्रकाश इस लोकसभा चुनाव में खुद नहीं उतरे हैं। होशियारपुर से उनकी पत्नी अनिता सोमप्रकाश ये चुनाव लड़ रही हैं। यही वजह है कि सोमप्रकाश के लिए भी अपना गढ़ बचाना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। 2019 लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार डॉ. राजकुमार चब्बेवाल को 48 हजार 530 मतों से मात दी थी।
इस बार सोमप्रकाश खुद मैदान में नहीं है, इसलिए पत्नी के चुनाव मैदान में उतरने के चलते उनकी जिम्मेदारी भी पहले से अधिक बढ़ गई है। डाॅ. चब्बेवाल इस बार कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी से चुनाव मैदान में उतरे हैं। इसी तरह कांग्रेस ने यामिनी गोमर और शिरोमणि अकाली दल ने चार बार के विधायक व पूर्व मंत्री सोहन सिंह ठंडल को चुनाव मैदान में उतारा है। इस चुनाव में अनिता सोमप्रकाश के सामने भी चुनौतियां कम नहीं है।
भाजपा नेतृत्व ने पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय सांपला की दावेदारी को खारिज करके उनको टिकट थमाई थी। हालांकि सीनियर नेताओं की तरफ से सांपला की नाराजगी दूर करने का दावा किया गया है, लेकिन पिछले कुछ समय में उनके करीबी पार्टी छोड़ रहे हैं। अनिता के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या पार्टी की गुटबाजी खत्म करने की है। यही कारण है कि स्थानीय नेताओं को एकजुट करने के लिए उनको काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है।