मरीज बीमारी से एक बार लेकिन उसके डर से पल-पल मरता है। बीमारी अगर कैंसर जैसी हो तो उसका खौफ ही मरीज को निचोड़कर रख देता है। मगर चंडीगढ़ के जीएमएसएच 16 की डाक्टर बंदना पांडेय ने इस धारणा को पूरी तरह से पलटकर रख दिया। साल 2010 में पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हैं।
यह सुनकर उन्हें और उनके पति को थोड़े वक्त के लिए धक्का लगा, लेकिन डा. बंदना ने कैंसर से लड़ने का पूरी तरह से मन बना लिया। उनके पति खुद कैंसर के नामचीन डाक्टर हैं। पहले डा. बंदना ने कैंसर के इलाज को समझा। कीमोथेरेपी के दौरान होने वाले साइड इफेक्ट के बारे में जाना।
उन्हें मालूम था कि इलाज के दौरान उनके बाल जा सकते हैं। भयंकर दर्द हो सकता है। स्वाद बदल सकता है। उल्टी व दस्त लग सकते हैं। इन सभी परिस्थितियों से निपटने के लिए वह पहले ही मानसिक रूप से तैयार हो गईं। उन्होंने मन में एक बात बैठा ली कि डाक्टर जो भी कहेंगे, उसे नियमानुसार फॉलो करेंगी।
कीमोथैरेपी कराने के लिए वे घर से अकेली जाती थीं। चार घंटे डे केयर सेंटर में बिताने के बाद खुद ही कार चलाकर घर वापस आती थीं। जब रेडियोथेरेपी करानी होती थी तो पूरे दिन की छुट्टी नहीं लेती थीं, बल्कि एक घंटे की छुट्टी लेकर वापस काम में जुट जाती थीं।
सर्जरी के पांचवें दिन ज्वाइन किया अस्पताल
कैंसर की सर्जरी के पांचवें दिन ही डा. बंदना पांडेय काम पर वापस लौट आई थीं। उन्होंने जब अस्पताल ज्वाइन किया तो उनके हाथों में टांके और ड्रेन लगी हुई थी।