पंजाब यूनिवर्सिटी की ओर से लर्न टू अर्न योजना के तहत 50 लाख का बजट निर्धारित किया गया था, लेकिन अधिकांश विभागों ने न विद्यार्थियों को काम दिया और न ही दाम। लाखों रुपये खाते में डंप पड़े हैं। महज हिंदी विभाग नजीर बना है। उसकी राह में भी तमाम रोड़े आए, लेकिन विभाग के जिम्मेदार लोगों ने प्रयास बंद नहीं किया और आखिर में पांच विद्यार्थियों का काम भी दिया और पैसे भी दिलवाए।
लाइब्रेरी, लैब में खाली पड़े पदों पर काम के लिए विद्यार्थियों को मौका दिए जाने की योजना का नाम लर्न टू अर्न थी। योजना का उद्देश्य था कि गरीब विद्यार्थी पढ़ाई के साथ अपना खर्चा भी निकाल लेंगे। 50 लाख का बजट निर्धारित हो गया। इसके बाद सभी विभागों को इसके लिए पहल करनी चाहिए थी, लेकिन अधिकांश ने नहीं की।
हिंदी विभाग ने शुरुआत की, लेकिन उसकी राह में दिक्कतें ही दिक्कतें खड़ी हुईं। हालांकि वीसी प्रो. राजकुमार ने इसमें दिलचस्पी ली तो विद्यार्थियों तक रकम पहुंच गई। लगभग डेढ़ लाख रुपये शोधार्थियों को मिला। हर शोधार्थी को प्रतिघंटे के हिसाब से 100 रुपये दिए गए थे। विभाग अध्यक्ष डॉ. गुरमीत सिंह का कहना है कि वीसी प्रो. राजकुमार के सहयोग से यह हो सका।
नियमों का सरलीकरण होना चाहिए
लर्न टू अर्न योजना के तहत छात्रों को काम देने के लिए पीयू ने इतने कठिन नियम बना दिए कि उनको पूरा कर पाना विभाग के लिए कठिन होता है। कई अड़ेंगे बीच में लग जाने के कारण विभाग के जिम्मेदार लोग इसमें दिलचस्पी नहीं लेते हैं और वहीं पर योजना धड़ाम हो जाती है। विभाग व विद्यार्थियों का कहना है कि इसके लिए नियमों का सरलीकरण होना चाहिए।