पंजाब विश्वविद्यालय सीनेट चुनाव को लेकर रार ठन गई है। कांग्रेसी व भाजपाई सीनेटर आमने-सामने आ गए हैं। हर कोई एक-दूसरे को मात देने की योजना बना रहा है। जानकारों के मुताबिक, एक नई चाल चली जा रही है। वह है पीयू का संचालन बोर्ड ऑफ गवर्नेंस के जरिए हो।
नई शिक्षा नीति में भी इसका प्रावधान किया गया है। इसी के मुताबिक माना जा रहा है कि पहले चांसलर कार्यालय से 36 सीनेटर मनोनीत होंगे। उसके बाद तय होगा कि सीनेट की अन्य निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव करवाए जाएंगे या नहीं। सूत्रों ने साफ कर दिया है कि अब समय बोर्ड ऑफ गवर्नेंस का है।
इस बोर्ड में वही लोग शामिल होंगे, जो चांसलर कार्यालय से मनोनीत होकर आएंगे। यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेसी सीनेटरों को बाहर का रास्ता देखना पड़ सकता है और इससे उन्हें नुकसान होगा। हालांकि इस चाल को मात देने के लिए वह हर रास्ता अपना रहे हैं।
.... और इस तरह आगे बढ़े कदम
पीयू सीनेट की बैठकों में कांग्रेसी व भाजपाइयों में हंगामा होना आम बात रही है। चाहे वह डीएसडब्ल्यू प्रकरण हो या फिर कोई और। सीनेट में कांग्रेसियों का बहुमत है। इसके कारण जीत उन्हीं के पाले में हमेशा रही है। डीएसडब्ल्यू प्रकरण को लेकर दोनों ग्रुपों में रार बढ़ गई थी।
केंद्रीय मंत्री सोमप्रकाश ने कांग्रेसियों की ओर से हंगामा करने के बाद यह कहा था कि वह धारा 370 हटा सकते हैं तो सीनेट का रिफॉर्म भी कर सकते हैं। वह सीनेट के हाल को देखकर गए थे और केंद्र सरकार को उन्होंने इसकी रिपोर्ट दी थी।
सांसद किरण खेर ने भी कहा था कि सीनेट का माहौल ठीक नहीं है। इसमें बदलाव की जरूरत है। इसी तरह भाजपा के पंजाब प्रांत के पूर्व अध्यक्ष प्रो. राजिंदर भंडारी ने भी कांग्रेसियों से साफ कहा था कि जितनी चाहे मनमानी कर लें लेकिन यह मनमानी अधिक दिन की नहीं हैं।
चंडीगढ़ से भाजपा के पूर्व अध्यक्ष संजय टंडन, सीनेटर डॉ. सुभाष शर्मा ने भी सीनेट रिफॉर्म की बात दावे से की थी। कहा कि आने वाली सीनेट का नजारा अलग होगा और अब सीनेट चुनाव सामने आए तो देखने में भी वही आ रहा है। उसी दिशा में भाजपाई कदम बढ़ा रहे हैं।
भाजपाइयों की चाल की काट निकालने के लिए कांग्रेसी सीनेटरों को अधिक दिमाग लगाना पड़ रहा है। मालूम हो कि सीनेट रिफॉर्म का मुद्दा पूर्व वीसी प्रो. अरुण ग्रोवर भी उठा चुके हैं। उन्होंने कई बार शासन को भी इस बारे में अवगत करवाया था।
यह भी संभव... पीयू फैकल्टी चुनाव सबसे आखिर में भी हो सकते हैं
यदि 31 अक्तूबर से पहले सीनेट चुनाव का नया शेड्यूल आया भी तो उसमें एक चाल और सामने आ सकती है। फैकल्टी चुनाव सबसे आखिर में करवाए जा सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि प्रमुख कांग्रेसी सीनेटर जो अपना दबदबा कायम रखते हैं वह फैकल्टी चुनाव लड़ते हैं और जीत भी जाते हैं।
वह इसलिए कि पीयू के वोटर्स को मनोनीत होने वाले सदस्यों में ग्रुप वाइज सदस्यों की संख्या का पता नहीं लग पाता और स्नातक व कॉलेज निर्वाचन क्षेत्र से कितने लोग किसके जीते, यह भी पता नहीं रह पाता है। इसके कारण कुछ वोटर प्रभाव में आकर वोट डालते हैं। सूत्रों का कहना है कि पीयू फैकल्टी चुनाव से पहले अन्य निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव हो सकते हैं। साथ ही मनोनीत सदस्यों की संख्या भी सामने आ जाएगी। उसके बाद फैकल्टी चुनाव होंगे तो गोयल ग्रुप के सामने एक संकट खड़ा हो सकता है।
सिंडिकेट का बदल सकता है नजारा
सूत्रों का कहना है कि यदि भाजपाई अपने दांव में कामयाब हुए तो सिंडिकेट का नजारा बदल जाएगा। गोयल ग्रुप का अभी तक कब्जा रहा है। बहुमत सिंडिकेट में गोयल ग्रुप के पास ही है। सीनेट का नजारा बदलने के बाद सिंडिकेट के चुनाव होंगे और भाजपा के सदस्य चुनकर अधिक आ सकेंगे। हालांकि गोयल ग्रुप भी किसी प्रकार की कोई कमी नहीं छोड़ने के मूड में है।