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2014 में ‘पंजाब की राजनीति में चौंकाने वाली एंट्री

Fri, 26 Dec 2014 08:40 AM IST
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब की सियासत में इस साल सबसे चौंकाने वाली घटना आम आदमी पार्टी की जीत रही। लोकसभा चुनाव में ‘आप’ का दिल्ली समेत सारे देश से सफाया हो गया, लेकिन अप्रत्याशित रूप से वह पंजाब में शिअद के बराबर चार सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। ‘आप’ के प्रदर्शन ने सारे सियासी विश्लेषकों को हैरान कर दिया।
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पंजाब के चुनाव में हमेशा से ही आमने-सामने की टक्कर रही है। एक तरफ कांग्रेस तो दूसरी तरफ शिअद गठबंधन रहता है। पंजाब के लोगों ने कभी तीसरे विकल्प को तरजीह नहीं दी।

बसपा या वाम दल भी तभी जीते जब उन्होंने किसी पार्टी के साथ गठबंधन किया। पिछले विधानसभा चुनाव में पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब (पीपीपी) ने दमदार उपस्थिति दर्ज कराई, पर उसे एक सीट भी नहीं मिली। इस साल भी लोकसभा चुनाव प्रचार का बिगुल बजा तो कांग्रेस और शिअद-भाजपा में ही मुकाबला दिखाई दे रहा था। दोनों पार्टियों के नेता भी एक-दूसरे पर ही हमले बोल रहे थे।
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चुपचाप लोग ‘आप’ से जुड़ते जा रहे थे

दूसरी ओर, चुपचाप लोग ‘आप’ से जुड़ते जा रहे थे, कारवां बनता जा रहा था। चुनावी प्रचार के तेज शोर के बीच अरविंद केजरीवाल पंजाब दौरे पर आए। उनके रोड शो में उमड़ी भीड़ देख दोनों दलों की नींद उड़ गई।

इसी के साथ दोनों दलों के नेताओं की जुबानी तोपों का मुंह ‘आप’ की तरफ भी मुड़ने लगा। संगरूर में भगवंत मान के व्यंग्य बाण युवाओं को खींच रहे थे, तो पटियाला में डॉ. धरमवीर गांधी की तकरीरों में लोग जुटने लगे थे। सभी हलकों में पार्टी को रिस्पॉन्स मिल रहा था। 30 अप्रैल को मतदान के दिन वोटर साइलेंट नजर आए।

16 मई को मतगणना हुई तो पंजाब के वोटरों ने नया इतिहास रच दिया। पहली बार कोई तीसरी पार्टी 24 प्रतिशत वोट लेकर चार सीटों पर जीती। संगरूर और पटियाला में तो जीत केआसार नजर आ रहे थे, लेकिन फरीदकोट और फतेहगढ़ साहिब जैसी ग्रामीण बेल्ट में ‘आप’ की जीत किसी के गले नहीं उतर रही थी। लुधियाना में पार्टी दूसरे स्थान पर रही, सबसे ज्यादा 5.33 लाख वोट संगरूर में मिले।

कांग्रेस को पीपीपी के बाद ‘आप’ ने दिया झटका

लोकसभा चुनाव में ‘आप’ की सफलता का सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ। 2012 के विधानसभा चुनाव में पीपीपी के चलते कांग्रेस हारी थी, लोकसभा चुनाव में ‘आप’ ने वही रोल निभाया। ‘आप’ को मिले वोटों के चलते कई हलकों में जीत कांग्रेस के हाथों से फिसल गई। आनंदपुर साहिब, फिरोजपुर, होशियारपुर और बठिंडा में कांग्रेस मामूली अंतर से हारी, यहां ‘आप’ उम्मीदवार काफी वोट ले गए। पटियाला व लुधियाना में कांग्रेस का सीधा मुकाबला ‘आप’ से रहा।

कुछ ही महीनों में गिरा ग्राफ
आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता जिस तेजी से बढ़ी, उसी तेजी से इसका ग्राफ गिर गया। 30 अप्रैल, 2014 को हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की लेकिन 21 अगस्त को हुए पटियाला और तलवंडी साबो उप चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा।

पटियाला में जहां लोकसभा चुनाव में पार्टी ने शिअद से ज्यादा वोट लेकर कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी थी। उसी हलके में उपचुनाव के दौरान ‘आप’ उम्मीदवार को सिर्फ 5634 वोट मिले। दोनों हलकों में ‘आप’ उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई।
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हाईकमान के रवैये से खिसका आधार

आम आदमी पार्टी के खिसकते आधार की वजह पार्टी के लोग भी हाईकमान को मानते हैं। पंजाब में जीत के तुरंत बाद राष्ट्रीय नेतृत्व ने कोई सुध नहीं ली। उल्टे वे दिल्ली समेत सब जगह हार और भावी रणनीति पर मंथन करते रहे। जीत के साथ पंजाब में कई नेताओं को सीएम की कुर्सी नजर आने लगी।

खुद को कन्वीनर या सबसे बड़ा नेता प्रोजेक्ट करने की जद्दोजहद शुरू हो गई, जिससे गुटबाजी बढ़ती गई। लेकिन हाईकमान ने फिर भी कुछ नहीं किया। लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद संगठन खड़ा करने की कवायद होनी चाहिए थी, वह भी नहीं हुई। आपसी गुटबाजी और विरोध के चलते एक समानांतर संगठन खड़ा हो गया। हाईकमान ने कुछ समय पहले सुच्चा सिंह छोटेपुर को सूबा कन्वीनर नियुक्त कर संगठन बनाने की कवायद शुरू की है, फिर भी पार्टी निकाय चुनाव के लिए तैयार नहीं है।
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