थैलेसीमिक पीड़ितों का जीवन रक्त पर ही निर्भर है। यदि रक्त मिलने में एक भी दिन देरी हो जाए तो वह मुसीबत में घिर जाते हैं। तबियत बिगड़ती है। सिर दर्द के बाद बुखार व अन्य दिक्कतें आने लगती हैं। वे कहते हैं कि उन्हें समय पर रक्त और दवाएं मिलती रहे तो वे आम लोगों की तरह जिंदगी बिता सकते हैं। 14 जून को वर्ल्ड ब्लड डोनर डे है।
थैलेसीमिक पीड़ितों ने शहरवासियों से अपील की है कि वे ज्यादा से ज्यादा ब्लड डोनेट करें, ताकि वे लंबी जिंदगी जी सकें। साथ ही मैरिज से पहले या प्रेग्नेंसी के दौरान स्क्रीनिंग जरूर कराएं, जिससे कोई दूसरा थैलेसीमिक जन्म न ले। आइए आपको मिलवाते हैं कुछ थैलेसीमिक युवकों से।
असिस्टेंट मैनेजर, फिर भी रक्त की दरकार
हिमाचल के बिलासपुर की रहने वाली प्रियंका के जन्म के छह महीने बाद ही थैलेसीमिया डिटेक्ट हो गया था। तब से आज तक उन्हें हर महीने दो बार ब्लड चढ़वाना पड़ता है। वीरवार को पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर के थैलेसीमिया वार्ड में रक्त चढ़वाने पहुंची प्रियंका ने बताया कि शुरुआत में काफी मुश्किल आती थी, लेकिन अब तो आदत बन चुकी है।
एचडीएफसी बैंक के घुमारहवीं ब्रांच में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत प्रियंका ने बताया ब्लड की कमी होते ही बुखार व दर्द शुरू हो जाता है। आयरन की मात्रा ज्यादा न हो इसके लिए हर दस घंटे में एक बार इंजेक्शन लगता है। बार-बार ब्लड चढ़ने से तिल्ली बढ़ जाती है, जिसके लिए सर्जरी करवानी पड़ती है।
यह सब तो झेला जा सकता है, लेकिन यदि रक्त न मिले तो एक पल आगे जिंदगी जीना मुश्किल होता है। ट्रांसफ्यूजन के दौरान साथी बैंक कर्मी प्रियंका का काम संभालते हैं। उनके पिता अनिल कुमार कहते हैं कि शुरुआत के छह साल तक रक्त के लिए भटकना पड़ा था, लेकिन जब से थैलेसीमिक एसोसिएशन के संपर्क में आए हैं, तब से राहत है। एसोसिएशन और पीजीआई की ओर से रक्त मिलने में कोई कमी नहीं आती है।
गौरव नहीं एडवोकेट गौरव अरोड़ा कहिए
थैलेसीमिया से पीड़ित गौरव अरोड़ा गर्व से कहते हैं कि उनके नाम के आगे अब एडवोकेट भी जोड़ा जाए। गंभीर बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद उन्होंने अच्छे नंबरों से एलएलबी पास की है। हाल ही में उन्होंने अपनी प्रेक्टिस भी शुरू कर दी है।
वे कहते हैं कि साल 1999 में थैलेसीमिया के बारे में पता चल गया था। तब से लेकर आज तक हर महीने दो बार पीजीआई में रक्त चढ़वाते हैं, ताकि जिंदगी आगे बढ़ सके। यदि थैलेसीमिया के प्रति जागरूकता होती तो शायद वे इससे पीड़ित नहीं होते। अब भी यही स्थिति है। लगातार केस बढ़ रहे हैं।
एक तो मैरिज से पहले सभी टेस्ट करवाएं और हर व्यक्ति साल में एक बार में रक्त जरूर दे। उन्होंने बताया कि अमर उजाला के रक्तदान अभियान काबिले तारीफ है। इससे हमें हौसला मिला है। जब ज्यादा रक्तदान होता है तो महसूस होता है कि इस गंभीर के बीमारी के साथ लोग हमारे साथ खड़े हैं।