लोकसभा चुनाव में अमृतसर से अरुण जेटली की हार के बाद से अकाली-भाजपा रिश्तों में पैदा हुई खटास अब कड़वाहट में बदलती नजर आ रही है। आए दिन विभिन्न मुद्दों पर भाजपा नेताओं के अकाली दल के खिलाफ बयान सामने आ रहे हैं। कभी रेत-बजरी के मुद्दे पर, तो कभी प्रॉपर्टी टैक्स पर।
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अब मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल द्वारा गत दो दिनों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित अन्य केंद्रीय मंत्रियों के सात बैठकों का मुद्दा भी गरमा गया है।
हालांकि, इस पर सीधे-सीधे तो कोई बयान नहीं आया है, लेकिन सूत्रों के अनुसार पंजाब भाजपा नेताओं में इस बात को लेकर नाराजगी है, कि उक्त बैठकों के दौरान उन्हें साथ नहीं रखा गया। न ही उक्त बैठकों के दौरान उठाए जाने वाले पंजाब के मसलों के संबंध में उनके साथ कोई विचार-विमर्श ही किया गया।
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साझे तौर पर विचार विमर्श की कवायद
पार्टी में चर्चा है कि दोनों दलों के बीच निरंतर बढ़ती जा रही यह दूरी कहीं किसी गंभीर फैसले का आधार न बन जाए। इस बारे में पंजाब भाजपा अध्यक्ष कमल शर्मा से संपर्क करने की कई बार कोशिश की गई, लेकिन हर बार उनका फोन स्विच ऑफ मिला।
वहीं, पार्टी की पंजाब इकाई के पूर्व अध्यक्ष और प्रदेश के पूर्व मंत्री बलराम सिंह दास टंडन ने इस मसले पर प्रतिक्रिया दी कि दोनों पार्टियों का गठबंधन काफी पुराना और मजबूत है। छोटी-छोटी बातों का इस पर कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन फिर भी यदि प्रदेश के साझा मसलों को केंद्र साथ उठाने से पहले उन पर साझे तौर पर विचार-विमर्श कर लिया जाए तो अच्छा है।
ड्रग्स, खनन, दरियाई पानी, आर्थिक संकट आदि प्रदेश के ऐसे मसले हैं, जिन पर गठबंधन सरकार के दोनों सहयोगी चिंतित हैं। इसलिए अच्छा हो यदि शिअद नेता, पंजाब भाजपा मंत्रियों व पदाधिकारियों को भी इस तरह के महत्वपूर्ण मौकों पर साथ रखें।
अकाली नेताओं के रवैये के कारण हारी बीजेपी
लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब में गठबंधन का प्रदर्शन आशानुरूप न रहने के बाद गठित हुई भाजपा समीक्षा कमेटी ने इसके लिए अकाली नेताओं के रवैये को ही मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया है। यूं तो प्रदेश की 13 में से 7 लोकसभा सीटों पर गठबंधन प्रत्याशियों को मिली हार का ठीकरा शुरू से ही भाजपा नेता शिअद के सिर फोड़ते आ रहे हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक अब समीक्षा कमेटी की रिपोर्ट ने भी इस पर मोहर लगा दी है। साथ ही पंजाब भाजपा नेताओं के कामकाज में कमी निकालते हुए उसमें सुधार के लिए भी कहा गया है, लेकिन मोटे तौर पर शिअद को ही गठबंधन के खिलाफ बने माहौल के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि जहां हालात में बदलाव के लिए शिअद से आम लोगों से जुड़े मसलों पर दो-टूक बात की जाए, वहीं भाजपा नेताओं को भी अपनी कमियों को दूर करने के लिए कहा जाए। इस सबके बीच पंजाब भाजपा से संबंधित मंत्रिमंडल या संगठनात्मक बदलाव से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
समीक्षा कमेटी ने विचार-विमर्श के दौरान विभिन्न मुद्दों पर गहन चिंतन किया।
पार्टी सूत्रों के अनुसार कमेटी ने व्यापार-उद्योग को राजस्व का मुख्य साधन मानते हुए इन पर लगे टैक्स, रेत-बजरी पर माफिया का कब्जा, अकाली नेताओं की स्थानीय स्तर पर मनमानियां, कॉलोनियों की रुगुलराइजेशन के लिए फीस वसूलने के बावजूद लोगों को आधारभूत सुविधाएं मुहैया न करवा पाना, सुविधा केंद्रों पर हर काम की फीस वसूल किया जाना, मैरिज पैलेसों पर लगाए गए भारी-भरकम टैक्स तथा शहरियों पर लागू किया गया प्रॉपर्टी टैक्स ही मुख्य रूप से गठबंधन की इस हालत के लिए जिम्मेदार रहे।
बेशक सरकार में दोनों पार्टियां बराबर की सहयोगी हैं, लेकिन कमेटी की राय यह रही कि लोगों के बीच मोटे तौर पर यह मैसेज है कि चलती तो अकालियों की है।