उधर, कांग्रेस का संगठन प्रदेश स्तर पर तो है लेकिन जिला और ब्लाक स्तर पर संगठन नाम की कोई चीज ही नहीं है। पिछले पांच साल से अधिक समय गुजर गया, कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष न तो ब्लाक स्तर पर कार्यकारिणी गठित कर पाए और न ही जिला स्तर पर।
यही वजह रही कांग्रेस इस लोकसभा चुनाव को संगठन के लिहाज से पूरी मैनेजमेंट के साथ नहीं लड़ पाई। टिकट घोषित होने के बाद सभी प्रत्याशी भी अपनी-अपनी सीटों तक सीमित रहे गए और इन प्रत्याशियों को ग्राउंड पर अपनी टीमों से काम लेना पड़ा। कांग्रेस के संगठन का सहयोग उन्हे अपेक्षाकृत कुछ खास नहीं मिल पाया।
जजपा आखिरी दौर इकाइयां ही बनती रह गई
इनेलो से अलग होने के बाद जननायक जनता पार्टी (जजपा) लोकसभा चुनाव में पहली बार उतरी। संगठन भी गठित किया लेकिन इसका विस्तार करते-करते बहुत देर हो गई। चुनाव शोर हो गया और आखिरी समय तक जजपा संगठन की विभिन्न इकाइयां ही गठित करने में लगी रही, जिस वजह से इन इकाइयों को ग्राउंड पर ज्यादा काम करने का पर्याप्त समय ही नहीं मिल पाया।
दूसरी ओर, विघटन के बाद इनेलो का संगठन भी ध्वस्त हो गया। कई पदाधिकारी इनेलो का दामन छोड़कर जजपा में चले गए। जिससे इनेलो को चुनाव के दौरान बड़ा नुकसान झेलना पड़ा।
इनके अलावा आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी को भी मजबूत और प्रभावशाली संगठन की कमी झेलनी पड़ी। ब्लाक व जिला स्तर पर इन पार्टियों ने नाममात्र के संगठन और वर्करों से ही काम चलाया, जिसके चलते इनके सभी प्रत्याशी चुनाव हार गए।