हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कड़ी मशक्कत के बाद फिर कांग्रेस में ताकत मिली है। अब प्रदेश में कांग्रेस को फिर सत्ता में लाने की जिम्मेदारी हुड्डा के कंधों पर आ गई है। हुड्डा भी उसी तरह हरियाणा में कांग्रेस को जीत दिलाना चाहते हैं, जैसे पंजाब में सीएम कैप्टन अमरिंदर ने मोदी लहर में दिलाई थी। पंजाब में कैप्टन के प्रदर्शन के बाद अब हुड्डा की खास दांव पर है। चूंकि, कैप्टन ने आलाकमान से लड़कर फ्री हैंड पाया था और भाजपा का विजय रथ रोकने में सफल रहे थे। अब हरियाणा में हुड्डा ने भी वैसे ही फ्री हैंड लिया है।
इसलिए उन पर जीत दिलाने का दबाव रहेगा। हुड्डा ने वर्चस्व की जंग में एक तीर से अनेक निशाने साधे हैं। धुर विरोधियों में शुमार डॉ. अशोक तंवर और किरण चौधरी को उन्होंने मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए चित कर दिया। 2014 विधानसभा चुनाव के टिकट आवंटन के समय से ही तंवर के साथ हुड्डा की खटपट शुरू हो गई थी। दिल्ली की किसान रैली में तंवर के साथ हुई मारपीट ने आग में घी डालने का काम किया था। इसके बाद तंवर तो हुड्डा के धुर विरोधी हो गए। किरण चौधरी का भी हुड्डा के साथ अंदरखाने तालमेल सही नहीं था।
किरण चौधरी बीते विधानसभा चुनाव के बाद सीएलपी लीडर तो बन गईं, लेकिन अधिकांश विधायक हुड्डा के ही साथ थे। किरण के समर्थन में अधिकांश विधायक नहीं थे। रणदीप सुरजेवाला सबके साथ तालमेल बिठाकर चलते रहे और उन्होंने अंतर्कलह के बीच किसी का न तो खुलकर विरोध किया, न ही समर्थन। वह दिल्ली दरबार में खुद को मजबूत करने में लगे रहे। हजकां से कांगेस में आए बिश्नोई दंपत्ति की भी अपनी अलग ही राह थी।
13 समर्थक विधायक दो साल से खोले रहे तंवर के खिलाफ मोर्चा
पूर्व सीएम हुड्डा शुरू से ही इसलिए मजबूत रहे, चूंकि उनके पास 17 में से 13 विधायकों का खुला समर्थन था। बीते दो साल से समर्थक विधायक और पूर्व विधायक, मंत्री कांग्रेस आलाकमान के समक्ष तंवर को हटाने की ही रट लगाए हुए थे। राई के विधायक जयतीर्थ दहिया ने तो हाथ में तंवर पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था। हुड्डा ने कांग्रेस के भीतर चल रही वर्चस्व की जंग तो ली है, अब उनके सामने बड़ा चैलेंज पार्टी की सत्ता में वापसी कराने का है। अगर इसमें वे सफल रहते हैं तो ही उनकी धमक पार्टी हाईकमान में बरकरार रहेगी। चूंकि, लोकसभा चुनाव में खुद हुड्डा व बेटे दीपेंद्र भी हार झेल चुके हैं।
सभी को एकजुट करने का रहेगा हुड्डा, सैलजा पर दबाव
हुड्डा की नई प्रदेशाध्यक्ष कुमारी सैलजा के साथ अच्छी कैमिस्ट्री है। लोकसभा चुनाव से काफी पहले दोनों के बीच राजनीतिक रिश्ते मधुर हो गए थे। हुड्डा ने इसके चलते ही सैलजा के नाम पर कोई आपत्ति नहीं जताई। अब चुनाव में दोनों की कैमिस्ट्री क्या रंग लाती है, इस पर निगाहें बनी रहेंगी। चूंकि, पार्टी के सभी नेताओं में तालमेल बिठाने के साथ सभी को एकजुट कर चुनाव में उतारना भी कोई कम मुश्किल काम नहीं होगा।
तंवर, किरण खेमे को साधना आसान नहीं
चुनाव से ठीक पहले संगठन में हुए बड़े बदलाव को अगर हुड्डा विरोधी खेमे ने अंदरखाने स्वीकार नहीं किया तो कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भितरघात का सामना करना पड़ सकता है। प्रदेश कांग्रेस में पांच साल से ज्यादा समय से तंवर राज चल रहा था और उनके अनेक समर्थक विधानसभा चुनाव में टिकट मिलने की आस भी लगाए हुए थे। ऐसे में तंवर के बदलने से जहां उनका टिकट का सपना टूटा है, वहीं खास समर्थकों में भी निराशा है। ऐसे में तंवर व सीएलपी किरण चौधरी खेमे को चुनाव में पूरे उत्साह के साथ उतारना सैलजा व हाईकमान के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।