भाजपा के कद्दावर नेता अरुण जेटली का लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब में पार्टी की जमीनी हकीकत से अवगत होना गठबंधन सरकार में प्रभावशाली पदों पर आसीन नेताओं के साथ ही प्रदेश पदाधिकारियों के सियासी भविष्य को भी प्रभावित करने वाला है।
जेटली को पंजाब भाजपा की जमीनी हकीकत का पता अमृतसर में भाजपा प्रत्याशी बनकर पहुंचने के बाद ही चला। लोगों के प्रदेश सरकार के प्रति रोष को समझने के बाद ही उन्होंने चुनाव के बीच में ही राज्य स्तरीय नेताओं पर ही भरोसा करने के बजाय, अपने निजी सहयोगियों की टीम अमृतसर बुला ली थी।
यह बात अलग है कि वह भी काम नहीं कर सकी और जेटली एक लाख से अधिक वोटों से कैप्टन अमरिंदर के हाथों हार गए।
जेटली ने अपनी हार को भाजपा की देशभर में हुई जीत के मुकाबले मामूली करार दिया है, लेकिन असल पिक्चर अभी बाकी है।
पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन की समीक्षा शुरू
सूत्रों के मुताबिक, पंजाब भाजपा के संगठनात्मक ढांचे और प्रदेश सरकार में मंत्रियों की संभावित फेरबदल के फैसले 26 मई को मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह और भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद हो सकते हैं।
सबसे पहले गाज विभिन्न निगमों, बोर्डों आदि में तैनात चेयरमैनों, वाइस चेयरमैनों और सदस्यों पर गिर सकती है। इस वक्त पंजाब भाजपा के पदाधिकारियों में अध्यक्ष कमल शर्मा सहित राजिंदर मोहन सिंह छीना, तरुण चुघ, सुभाष शर्मा आदि शामिल हैं।
प्रदेश सरकार में मंत्री और अन्य प्रभावशाली पदों पर तैनात पंजाब भाजपा नेताओं में भगत चूनी लाल, अनिल जोशी, मदन मोहन मित्तल, सुरजीत ज्याणी, तीक्ष्ण सूद, प्रो. राजिंदर भंडारी, डॉ. नवजोत कौर सिद्धू, केडी भंडारी, सोम प्रकाश शामिल हैं। बेशक भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व इस वक्त सरकार गठन में व्यस्त है, लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन की भी बारीक समीक्षा शुरू हो चुकी है।
पार्टी अपने कोटे की 23 विधानसभा सीटों में से अकाली-भाजपा गठबंधन प्रत्याशियों को केवल आठ पर ही बढ़त दिला पाई। वहीं, पार्टी के 12 विधायकों में से केवल 6 के हलकों में ही गठबंधन प्रत्याशियों को लीड मिली है।
सिद्धू फैक्टर भी चर्चा का केंद्र
पंजाब के नतीजों पर चल रहे विचार-विमर्श में अमृतसर से पूर्व सांसद नवजोत सिद्धू के खिलाफ प्रदेश में तैयार किए गए माहौल से संबंधित पहलू भी शामिल है। सिद्धू की खिलाफत न केवल भाजपाइयों, बल्कि अकालियों ने भी की थी।
जेटली पर अमृतसर से चुनाव लड़ने का दबाव बनाया गया। उनसे कहा गया कि वह केवल नामांकन करने आएं और फिर चुनाव के बाद जीत का सर्टिफिकेट ले जाएं। जेटली यहां आकर पंजाब भाजपा और प्रदेश सरकार की जमीनी हकीकत से रूबरू तो हुए ही, मतदान पूरा होने तक अमृतसर लोकसभा क्षेत्र से बाहर भी नहीं निकल पाए।
भाजपा के अति विश्सनीय सूत्रों के अनुसार, बेशक जेटली हार गए, लेकिन प्रदेश में भाजपा की हालत में सुधार के लिए वह चिंतित हैं। जानकारों का कहना है कि 26 मई के बाद पंजाब के संबंध में पार्टी बड़े फैसले लेगी, इतना तय है।
इस बारे में पंजाब भाजपा प्रभारी शांता कुमार ने बताया कि समय आने पर सब सामने आ जाएगा। फिलहाल सभी पहलुओं पर गंभीर विचार-विमर्श जारी है।