कंपनी के खिलाफ अगर दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया जारी है तो भी चेक बाउंस की शिकायत और इसके तहत हो रही कार्रवाई को अवैध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने यह आदेश सुपरटेक लिमिटेड के निदेशकों की याचिका को खारिज करते हुए जारी किया है।
याचिका दाखिल करते हुए चंडीगढ़ निवासी मोहित अरोड़ा व अन्य ने एडवोकेट आफताब सिंह खारा के माध्यम से हाईकोर्ट को बताया कि वे सुपरटेक लिमिटेड के निदेशक हैं और उनकी कंपनी के खिलाफ दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में विचाराधीन है। याचिकाकर्ताओं के खिलाफ देवेंद्र सिंह बबला व अन्य ने चेक बाउंस की शिकायत 2 जून 2021 को दी थी।
इस शिकायत के आधार पर मजिस्ट्रेट ने 20 सितंबर 2022 को याचिकाकर्ताओं के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। याची ने कहा कि जब उनके खिलाफ दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया विचाराधीन है तो समानांतर नेगोशिएबल एक्ट की धारा 138 के तहत स्वतंत्र वसूली व आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती है।
याचिका का विरोध करते हुए शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट आफताब सिंह खारा ने कहा कि याचिकाकर्ता ने केवल अपने पैसे की वसूली के लिए यह शिकायत नहीं दी है बल्कि यह चेक में दर्ज राशि का भुगतान करने के चलते कार्रवाई की मांग को लेकर दी है। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि दोनों मामलें अलग हैं क्योंकि दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया सिविल है, जबकि एनआई एक्ट आपराधिक कार्रवाई है। ऐसे में दोनों कार्रवाई समानांतर चल सकती है। हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों के साथ ही आपराधिक शिकायत और इसके आधार पर चल रही कार्रवाई के तहत जारी गैर-जमानती वारंट को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
यह था मामला
शिकायतकर्ता ने गुरुग्राम में कंपनी का फ्लैट बुक किया था। इस फ्लैट का कब्जा नहीं मिलने पर रेरा में शिकायत दी गई थी। रेरा ने शिकायतकर्ता को पैसा वापस करने का कंपनी को आदेश दिया था। आदेश के बाद कंपनी की ओर से शिकायतकर्ता को बाद की तारीख का चेक दिया गया था, जो बाउंस हो गया। चेक बाउंस होने पर चंडीगढ़ की अदालत में शिकायत दी गई थी। इसके आधार पर निदेशकों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए गए थे।