चंडीगढ़। समाज के निचले तबके के लोग, श्मशानों के अंधकारों में रहने वाले डोम, गंगा नदी के तट पर रहने वाले बागड़ी, दुसाध और मांझी समुदाय, घने जंगलों में रहने वाले संथाल, ये सब मूल अधिकारों से वंचित हैं। इसी अंधकार और अंधविश्वास पर कटाक्ष करने वाली बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी की कहानी ‘बांयेन’ पर आधारित नाटक का शुक्रवार को मंचन किया गया।
चंडीगढ़ संस्कृति विभाग और टैगोर थिएटर सोसायटी की ओर से तीन दिवसीय नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा थिएटर फेस्टिवल का आगाज हुआ। पहले दिन निर्देशक ऊषा गांगुली द्वारा निर्देशित नाटक ‘बांयेन’ में दिखाया कि चंडी दासी काफी छोटी उम्र में ही मरे हुए जानवरों को दफनाने के काम में झोंक दी जाती है। अपने पूर्वजों के काम को करने की उसकी जिम्मेदारी का हवाला देकर उसे बेहद कष्टप्रद जीवन जीने को मजबूर किया जाता है। कालांतर में वो मलिंदर से विवाह करने का निर्णय लेती है जो सरकारी श्मशान में काम करता है और चंडी की जिम्मेदारी लेने को तैयार हो जाता है। लेकिन बाद में यही मलिंदर उसे एक ‘बांयेन’ (डायन) घोषित कर देता है। इसके बाद चंडी सामान्य जीवन जीने के अधिकार से भी वंचित हो जाती है। धीरे धीरे वो स्वयं मान लेती है कि ऐसा अमानवीय जीवन जीना ही उसकी नियति है। चंडी जिसे अंधविश्वास के नाम पर दर्दनाक कीमत चुकानी पड़ती है, वह न सिर्फ मातृत्व से हाथ धो बैठती है, बल्कि अपनी चेतना का बीज भी खो बैठती है। अंतत: उसका पुत्र युवा पीढ़ी में बदलाव के प्रतिनिधि के रूप में उभरकर आता है और आत्म सम्मान और गरिमा की लौ जलाने में सफल होता है।
नाटक में भूमिका अदा करने वाले कलाकार
नाटक में बोरनाली बोरहा, अपराजिता डे, अन्नपूर्णा सोनी, सम्पा मंडल, मेधा एच, श्रुति मिश्रा, तनीशा देशवाल, प्रतीक्षा जैन, शाहीन, आकांक्षा पाल, प्रियदर्शनी पूजा, दीप कुमार, राजीब कलिता, सिकंदर कुमार, यतेंद्र बहुगुणा, शाहनवाज खान, सिद्धेश्वर काशीनाथ थोराट, विपिन कुमार, राघवेंद्र प्रताप सिंह, धूताड़मल रवि बाबा साहेब, मोहनलाल सागर, महेंद्र सिंह पंवार और राजू रॉय कलाकार शामिल रहे।