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बेमिसालः कारतूस और कलम के सिपाही हैं कर्नल एसएस सोही, फौजियों के लिए लड़ रहे कानूनी जंग

Tue, 09 Apr 2019 11:13 AM IST
खुशबू गोयल अमित शर्मा, अमर उजाला, मोहाली
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एसएस सोही
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जवानी में दुश्मनों से लोहा लेकर जिसने देश की सरहदों की रखवाली की, वहीं अब वह पूर्व फौजियों व उनके परिवारों का सहारा बने हुए हैं। उनको बनता मान सम्मान व हक दिलाने के लिए अदालत तक संघर्ष कर रहे हैं और इस मिशन में काफी हद तक कामयाब रहे हैं। यहां बात हो रही है शहर की प्रमुख हस्ती व एक्स सर्विस मैन ग्रीवांसेस सेल के प्रधान रिटायर्ड कर्नल एसएस सोही की। इनका बस एक ही सपना है कि पूर्व फौजी व उनके परिवार खुशहाली से अपना जीवन जी पाएं। उन्हें किसी भी प्रकार की दिक्कत न आए।
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पाकिस्तान में पैदा हुए, बंटवारे के बाद भारत आए
कर्नल सोही ने बताया कि शुरू से ही उनका जीवन संघर्ष भरा रहा है। 1945 में उनका जन्म गुजरावाला पाकिस्तान में हुआ था। इसके बाद देश का बंटवारा हुआ। 1947 में वे भारत आ गए थे। उनके परिवार को हरियाणा के करनाल के पास नीलोखेड़ी गांव में जगह अलाट हो गई। वहीं, पर उन्होंने 12वीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद स्पोर्ट्स कालेज जालंधर में दाखिला लिया, क्योंकि वह हॉकी और स्वीमिंग के अच्छे खिलाड़ी थे।

ब्रिगेडियर चांदपुरी ने सिलेक्ट किया था
कर्नल सोही ने बताया कि वह कालेज में थे। इसी बीच उनके तीन पंजाब रेजिमेंट से ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी उनके कालेज आए। उस समय सेना को एक तैराक की जरूरत थी।। वह उस समय पंजाब को रिप्रेजेंट करते थे। इसी बीच उनकी सेना में सिलेक्शन हो गई। इसके बाद वह यूनाइटेड नेशन के मिशन पर गाजा चले गए। इस दौरान वहां पर भी वह तैराकी में चैंपियन बने। इस चैंपियनशिप में 7 देशों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था।
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1971 की जंग में भी लिया हिस्सा

उन्होंने बताया कि उन्होंने सेना में कमीशन के लिए ट्राई किया। 1970 में उन्हें कमीशन मिल गया और तीन बिहार रेजिमेंट ज्वाइन कर ली। 1971 के युद्ध में भी उन्होंने हिस्सा लिया। इस दौरान पाकिस्तान को करारा जवाब दिया।

पूर्व फौजियों की हालत देखने के बाद बनाई संस्था
सेना में तीस साल नौकरी के बाद जनवरी 1996 में वह सेना से रिटायर हो गए। उन्होंने दो साल तक चंडीगढ़ के नामी होटल में जनरल मैनेजर के रूप में नौकरी की। इसी बीच उनके बच्चे सेटल हो गए। साथ ही बच्चों ने उन्हें नौकरी करने से मना कर दिया। हालांकि इस दौरान वह आर्मी से रिटायर लोगों की स्थिति देखकर आहत हो गए, क्योंकि ज्यादातर बड़े संस्थानों के बाहर पूर्व फौजी सेल्यूट मारते दिखे, जिस पर वह आहत हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि फौजियों की हालत खराब है। इसके बाद उन्होंने पूर्व फौजियों के लिए काम करने का फैसला लिया। साथ ही एक एनजीओ बनाने का निर्णय लिया।

350 पूर्व फौजियों व उनके परिवारों को दिलाया हक
कर्नल सोही ने बताया कि करीब 18 साल से एनजीओ चला रहे हैं। अब तक उनकी एनजीओ 350 पूर्व फौजी व उनकी विधवाओं को पेंशन दिला चुकी है। 450 केसों में सीधे तौर पर आर्मी परिवारों की मदद की। इसके अलावा पूर्व फौजियों व उनके बच्चों को नौकरियों दिलाने व स्कालरशिप दिलाने में मदद कर रहे हैं। इतना ही नहीं एनजीओ ने एक बेटी को पिता की पेंशन तो कई फौजियों को रिटायरमेंट के 52 साल बाद पेंशन दिलाई है। हाल ही में उनकी एनजीओ ने तीन लोगों को पेंशन दिलाई।

हर शुक्रवार सुनते हैं फौजियों से जुड़े मामले
कर्नल सोही ने बताया कि हर शुक्रवार अपना वीकली ऑफिस लगाते हैं। यह ऑफिस वह कैंटीन या सैनिक सदन में लगाते हैं, जहां पूर्व फौजियों व उनसे जुड़े मामले सुने जाते हैं। वह इन मामलों में अधिकारियों को पत्र लिखकर पूर्व फौजियों को न्याय दिलाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। उन्होंने बताया कि 18 साल में 4 शुक्रवार ऐसे गए हैं, जब उन्होंने लोगों की सुनवाई नहीं की। एक बार तब जब वह बेटे के पास अमेरिका गए हुए थे जबकि दूसरी बार जब उनका आपरेशन हुआ था।
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