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बॉक्सर मनोज कुमारः एथलीट बनना चाहता थे, ओलंपिक में दिखाएंगे बॉक्सिंग

Wed, 27 Jul 2016 10:08 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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बॉक्सर मनोज कुमार - फोटो : फाइल फोटो
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मिलिए एक ऐसे खिलाड़ी से, जो एथलीट बनना चाहता था, लेकिन अब ओलंपिक में बॉक्सिंग के रिंग में हुनर दिखाने उतरेगा। ये प्रोफाइल है, बॉक्सर मनोज कुमार का। ओलंपिक में भारत की तरफ से मेडल के दावेदार बाक्सर मनोज कुमार का कहना है कि वह ओलंपिक में वह अपने पंच से विरोधियों को मात देना चाहते हैं।
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उन्होंने कहा कि देश में खेल सुविधाएं मुहैया करवाने पर समुचित ध्यान दिया जाए तो भारत खेलों मे भी महाशक्ति बन सकता है। हरियाणा के कैथल निवासी ओलंपियन और 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स मे गोल्ड मेडल विजेता बॉक्सर मनोज कुमार ने ओलंपिक में शामिल होने के लिए रियो रवाना होने से पहले अमर उजाला से विशेष बातचीत में यह बातें कहीं।

उन्होंने बताया कि रियो ओलंपिक केलिए तैयारियां काफी अच्छी चल रही हैं। पटियाला में पिछले कई दिनों से कैंप लगा हुआ था। इस दौरान कुल 12 ट्रेनिंग सेशन में अलग- अलग मुक्केबाजों के साथ अभ्यास किए गए। यहां मेरे कोच राजेश भी साथ रहे। उन्होंने ट्रेनिंग सेशन के दौरान मुकाबलों पर पैनी नजर रखी और हर बार  सुधार केलिए जरूरी टिप्स भी दिए।
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बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि देश मे प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। युवाओं और बच्च्चों के लिए खेल के मैदान कम हैं, मैदान हैं तो कोच नहीं हैं। अगर इस तरफ समुचित ध्यान दिया जाए तो खेलों में स्थिति सुधर सकती है।
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एथलीट से बॉक्सर तक का सफर

बॉक्सर मनोज कुमार - फोटो : फाइल फोटो
मनोज ने बताया कि उनके बॉक्सिंग में आने के पीछे एक रोचक स्टोरी है। उन्होंने कहा कि ‘मैं शुरू में एथलीट था और मेरे बड़े भाई (जो मेरे कोच भी हैं) राजेश कुमार मुक्केबाजी करते थे। उन्हें देख कर वैसे ही नकल करता रहता था । एक दिन कुछ लड़कों ने मेरी फाइट एक स्टेट मेडलिस्ट से करा दी।

उससे मैं काफी छोटा था, लेकिन मैंने बेहतर मुकाबला करते हुए कई पंच जड दिए। जब मेरे भाई को पता चला तो उन्होंने कहा कि मैं तुझे मुक्केबाजी सिखाऊंगा। इसके बाद वह मेरे कोच बन गए और मुझे ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी।  मेरे बड़े भाई की मेहनत का फल है कि आज में दूसरी बार ओलंपिक खेलने जा रहा हूं।

गांवों में सुविधाएं मिलें तो युवा न भटकें
मनोज से जब पूछा गया कि आपके गांव मे कोई स्टेडियम नहीं है, जब वहां जाते हैं तो अभ्यास कहां करते हैं। जवाब में मनोज ने बताया कि घर में । उन्होंने कहा कि हमारे देश के खेलों में पिछड़ने का एक कारण यह भी है कि युवाओं और बच्चों के पास खेलने के लिए मैदान ही नहीं है।

मैदान हैं तो कोच नहीं है। अगर गांव में स्टेडियम होंगे तो युवा खेल में व्यस्त रहेंगे, जिससे न केवल देश को अच्छे खिलाडी मिलेंगे बल्कि युवाओं का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। वे नशे आदि  से भी दूर रहेंगे ।
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